नवरात्रि पर विशेष घट स्थापना के दिन शुभ कर्मों के खेती कर कलश स्थापन किया

रिपोर्ट अनमोल कुमार

सुपौल। प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय सिमराही बाजार स्थित ओम शांति केन्द्र और परमात्मा अनुभूति संग्रहालय में नवरात्रि पर विशेष घट स्थापना के दिन शुभ कर्मों के खेती कर कलश स्थापना रखा गया।इस अवसर पर नवरात्रि का आध्यात्मिक रहस्य बताते हुए स्थानीय सेवा केंद्र प्रभारी राजयोगिनी बबीता दीदी जी ने कहा कि प्राचीन पौराणिक कथा है कि राक्षसों के असर से देवता जब काफी त्रस्त हो गए तो उन्होंने अपनी रक्षा के लिए शक्ति की आराधना करने लगे। फलस्वरुप शक्ति ने दुर्गा रूप में प्रकट होकर राक्षसों का विध्वंस किया और देवताओं के देवत्व की रक्षा की। देवताओं को सुरक्षित रखने के लिए यह देवी असुरों से सदैव संग्राम करती रहती थी। अतः इस देव-असुर संग्राम का रूप देकर एक पूजा का रिवाज़ चलाया गया तब से अनेक देवियों की पूजा का प्रचलन हिन्दू धर्म में प्रचलित हुआ। आज भी हिन्दू समाज में शक्ति के नौ रूपों को नौ दिनों तक पूजा चलती है जिसे ‘नौ दुर्गे’ या ‘नवरात्रि’ कहते हैं।


उन्होंने नवरात्र के नौ देवियों के बारे में वर्णन करते हुए कहा नवरात्र का पहला दिन दुर्गा देवी के रूप में माना जाता है। वह ‘शैलपुत्री’ के नाम से पूजी जाती है। बताया जाता है कि यह पर्वतराज हिमालय की पुत्री थी इसलिए पर्वत की पुत्री ‘पार्वती या शैलपुत्री’ के नाम से शंकर की पत्नी बनी। दुर्गा को शिव-शक्ति कहा कहा जाता है। हाथ में माला भी दिखाते हैं। माला परमात्मा के याद का प्रतीक है। जब परमात्मा को याद करेंगे तो जीवन में सामना करने की शक्ति, निर्णय करने, सहन करने, सहयोग करने, समेटने, परखने, समाने और विस्तार को संकीर्ण करने की यह अष्ट शक्तियाँ जीवन में प्राप्त होती हैं। इसलिए दुर्गा को अष्ट भुजा दिखाते हैं। हाथ में बाण दिखाते हैं जिसका अर्थ है- ज्ञान रूपी बाण मुख द्वारा चलाकर विकारों का संहार किया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सेवानिवृत्ति कमांडेंट प्रणव जायसवाल जी ने अपने उद्बोधन देते हुए कहा कि ब्रह्माकुमारी संस्थान के ज्ञान में वर्तमान समय स्वयं निराकार परमपिता परमात्मा इस कलियुग के घोर अंधकार में माताओं-कन्याओं द्वारा सभी को ज्ञान देकर फिर से स्वर्ग की स्थापना कर रहे हैं। परमात्मा द्वारा दिए गए इस ज्ञान को धारण कर अब हम ऐसी नवरात्रि मनाये जो अपने अंदर रावण अर्थात् विकार है, वह खत्म हो जाये, मर जाये। यही है सच्चा-सच्चा दशहरा मनाना। ऐसा दशहरा मनायें, तब ही दीवाली अर्थात् भविष्य में आने वाली सतयुगी दुनिया के सुखों का अनुभव कर सकेंगे। इसलिए हे आत्माओं! अब जागो, केवल नवरात्रि का जागरण ही नहीं करो बल्कि इस अज्ञान नींद से भी जागो। यही सच्ची-सच्ची नवरात्रि मनाना और जागरण करना है। ऐसी नवरात्रि की आप सभी को मुबारक हो।
मौके पर वरिष्ठ समाजसेवी प्रोफेसर बैजनाथ प्रसाद भगत, व्यावसायिक अरुण जायसवाल, रंजीत कुमार, ब्रह्माकुमारी पूजा बहन,सुमन बहन, ब्रह्माकुमारी बिना बहन, सावित्री देवी, सीता देवी,शकुंतला देवी, महेंद्र यादव,ब्रह्माकुमार किशोर भाई जी इत्यादि मौजूद थे।

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