बरकत अली/मोहर्रम विशेष : मोहर्रम की 10 तारीख और जुम्मे का दिन है। इमाम मज़्लूम رضی اللہ عنہ अपने खेमे से निकल कर दुश्मनों की तरफ़ बढ़ते हैं। फरमाया: “जल्दी ना करो। इंसाफ से काम लो तो भलाई पाओ। वरना अपने साथियों को जमा करो और जो करना है कर गुज़रो मैं मोहलत नहीं चाहता।” इमाम की आवाज़ बहनों तक जा पहुंची।
वह बेइख़तियार रोने लगीं। इमाम ने हज़रते अब्बास और इमाम जैनुलआ़ब्दीन को चुप कराने के लिए भेजा। फिर फ़रमाया: “खुदा की कसम इन्हे बहुत रोना है।” फिर दुश्मनों की तरफ़ देखकर फ़रमाया: “जरा मेरे बारे में सोचो तो सही, क्या मेरा क़त्ल तुम्हारे लिए जाइज़ है ? क्या तुम ने नहीं सुना अल्लाह के रसूल ﷺ ने फ़रमाया मैं और मेरे भाई जन्नत के नौजवानों के सरदार हैं। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। तो आपने एक-एक का नाम पुकारा।
और भी बहुत से लोगों ने जाकर इन लोगों को नसीहत की। मगर इनके कानों पर जूं ना रेंगी। और जवाब यह दिया कि हम नहीं जानते तुम क्या कहते हो। और कुछ देर में तुम और तुम्हारा सरदार कत्ल किए जाएंगे।
हज़रते हुर और चंद लोग इमाम के लश्कर में आ गए। इमाम ने लश्कर को तरतीब दी। रात खंदक खोद कर जो लकड़ियां जमा कराई गई थी उनमें आग लगा दी गई। कि दुश्मन पीछे से हमला ना करें।
फिर बड़ी ही सख्त जंग छिड़ी। जिसकी तफ़्सील तहरीर करने की हिम्मत इजाजत नहीं देती। क्या गुजरे किसी पर जब वह अपने भाईयों, भतीजों और बेटों को कुर्बान होने के लिए भेजे, उन्हें कुर्बान होता देखे, फिर उनकी लाशें अपने हाथों पर उठाकर लाए। इमाम की तरफ़ से सब ने बड़ी हिम्मत का इजहार करते हुए जंग लड़ी। और एक-एक करके शहीद हो गए।
अब सिर्फ इमाम जैनुल आबिदीन, और इमाम हुसैन رضی اللہ عنہ ही मर्दों में बाकी रह गए थे। इमाम जैनुल आबिदीन ने इजाज़त मांगी मगर इमाम ने उन्हें मना फ़रमाया। इसके बाद सब्र की तलकी़न करके इमाम आली मकाम मैदान की तरफ़ चल दिए। क्या बेबसी का आलम होगा। इमाम की बहन और बेटियों के दिल पर क्या गुज़रती होगी।
इमाम मज़्लूम मैदान में पहुंचकर अपने वालिद शेरे ख़ुदा हज़रते अली رضی اللہ عنہ की तरह़ दुश्मनों पर टूट पड़े। 33 जख़्म नेज़े और 34 तलवार के लगे, तीरो का तो शुमार ही नहीं। आख़िर लड़ते-लड़ते गिर गए और जिस्म में उठने की ताक़त ना रही। बार-बार उठते हैं और गिर जाते हैं। इस हालत में सनान बिन अनस नारी जहन्नामी ने नेज़ा मारा कि अर्श का तारा जमीन पर टूट कर गिर गय। सनान जहन्नामी ने ख़ोली बिन यज़ीद से कहा सर काट ले। ख़ोली बिन यज़ीद का हाथ कांपने लगा। फिर सनान मरदूर खुद घोड़े से उतरा और अल्लाह के रसूल ﷺ के 3 दिन के भूखे प्यासे जिगर के टुकड़े का सर तन से जुदा कर दिया।
लेकिन उन्हें इस पर भी सब्र ना आया। तो इमाम मज़्लूम رضی اللہ عنہ का लिबास उतार कर आपस में बांट लिया। अभी भी अदावत की आग ना बुझी तो अहले बैत के खैमों को लूटा। औरतों के सर से दुपट्टे और जेवर उतार लिए गए। अभी भी सब्र ना आया। एक जहन्नामी ने आवाज लगाई। कि हुसैन के जिस्म पर घोड़े दौड़ाओ। तो 10 बदबख्त आए और खातून-ए-जन्नत की गोद के पाले के जिस्म पर घोड़े दौड़ाए। और इमाम मज़्लूम رضی اللہ عنہ की हड्डियां रेज़ा रेजा़ कर दी गईं।




