DR. BJENDRA SINHA का संपादकीय लेख *सामाजिक न्याय व समतामूलक समाज की रचना की जरुरत*

DR. BJENDRA SINHA :- यह हमारा दुर्भाग्य रहा कि आजादी के बाद भी समाज का एक बडा वर्ग पीछे हो गया। अगर शुरू से ही वंचित व उपेक्षित वर्ग के लोगों को साथ रखा गया होता तो देश गुलाम ही नहीं होता। आजादी के इतने वर्ष बाद व वैज्ञानिक युग में भी कुछ विशेष जाति वर्ग के लोग जातिगत भेदभाव अन्याय, असमानता व असन्तुलन के शिकार हैं। हम सभी को समझना होगा कि मनुष्य के रूप में जन्म लेने वाले हम सभी की हैसियत बराबर होती है। लेकिन इस आधुनिक युग में कुछ लोग सामन्ती मूल्यों को ढो रहे हैं व दम्भ प्रभुता अहंकार से ग्रसित हैं जिसके दुष्परिणाम स्वरूप जालोर जैसी दुखद घटनाएँ होती है। ऐसी सभी दुखद घटनाओं का मूल कारण जातिगत कट्टरता ही है। जातिगत कट्टरता की पराकाष्ठा ये है कि समाज में आज भी ऑनर किलिंग यानि कथित सम्मान के लिए परिजनों द्वारा अपनी ही संतान की निर्मम हत्या कर दी जाती है। जिसे सम्मान के लिए की गयी हत्या का रूप दे दिया जाता है। ऐसी दुखद व नफरत जनित हत्याएँ जब होती हैं तो हमारी सारी मानवीय प्रगति धरीकी धरी रह जाती है। ऐसी वीभत्स घटनाएँ पशुभाव से भी हीनता व अनैतिकता की ओर ले जाती है।जो मानवाधिकारो का हनन भी है। ऐसा लगता है कि सामाजिक व्यवस्था का सूत्र आज भी थोड़े से लोगों के हाथों में है जिनके सामन्ती सोच के कारण समाज के बहुत बड़े वर्ग का शोषण व दमन होता है। इस प्रकार वंचित व शोषित जनसमाज शैक्षिक आर्थिक व सामाजिक रूप से अप्रत्यक्ष रूप से पराधीन होता है भले ही देखने में वह स्वाधीनता दिखाई देता है। वास्तव मेँ आजादी के साथ प्राप्त राजनैतिक स्वतंत्रता के बावजूद पूर्ण आजादी का सपना अभी भी शेष है। नैतिक, आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र की आजादी के बिना सामाजिक बदलाव का उद्देश्य असम्भव है। इन सभी समस्याओं का समाधान समतामूलक समाज की रचना है।संविधान में उल्लेखित समानता के सिद्धांत में समतामूलक समाज की अवधारणा है जिसकी रचना अभी भी शेष है। समतामूलक समाज की रचना के लिए समता व सामाजिक न्याय का विचार ही सर्वोत्तम होना चाहिए। समता के भाव को स्वीकारने से ही सामाजिक शान्ति आएगी। जातिगत भेदभाव को खत्म करने सामाजिक लोकतंत्र को मजबूत करने सामाजिक न्याय अपनाने व समता के भाव को समझने स्वीकारने व अपनाने की जरुरत है ।वंचित व उपेक्षित वर्ग लोगों के आर्थिक शैक्षिक व सामाजिक उत्थान की दिशा में कदम बढाना होगा। नये भारत के निर्माण की चर्चा इन दिनों जोरो पर है।परन्तु विकास का पैमाना सिर्फ साधनों व सुविधाओं की अधिकता से ही नहीं बल्कि संस्कारित व्यक्तित्व व बेहतर समाज के निर्माण से भी है। दलितों वंचितों पिछडो व उपेक्षित वर्ग लोगों के प्रति अमानवीय व कटुता पूर्ण व्यवहार को त्यागकर सम्मान व प्रेमपूर्ण व्यवहार जरूरी है।
आपका
सेवाभावी शुभचिंतक बिजेन्द सिन्हा
निपानी .पाटन .दुर्ग। Mo.8074963971.
B. R. SAHU CO-EDITOR
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