30 किलोमीटर पैदल चलकर कलेक्ट्रेट पहुंचीं छात्राएं: यह सिर्फ एक पैदल मार्च नहीं, बेलगाम व्यवस्था के गाल पर करारा तमाचा है!

30 किलोमीटर पैदल चलकर कलेक्ट्रेट पहुंचीं छात्राएं: यह सिर्फ एक पैदल मार्च नहीं, बेलगाम व्यवस्था के गाल पर करारा तमाचा है!

अंबिकापुर / शिवपुर:

जब 30 किलोमीटर की तपती सड़क पर सैकड़ों मासूम बच्चियों के नन्हे पैर छाले सहते हुए आगे बढ़ते हैं, तब सिर्फ दूरी तय नहीं होती… उस हर एक कदम के साथ प्रशासनिक तंत्र की साख और संवेदनशीलता ध्वस्त होती जाती है। शिवपुर (अंबिकापुर) स्थित एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय की छात्राओं द्वारा कलेक्ट्रेट तक किया गया यह 30 किलोमीटर का पैदल मार्च कोई सामान्य विरोध प्रदर्शन नहीं है। यह उन तमाम दावों की पोल खोलता एक कड़वा सच है, जो हर साल सरकारी फाइलों में आदिवासी और ग्रामीण बच्चों के उत्थान और सर्वसुविधायुक्त आवासीय शिक्षा के नाम पर दर्ज किए जाते हैं।

बदहाली की हद: जब हॉस्टल बना यातना गृह

​एकलव्य विद्यालयों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण व जनजातीय प्रतिभाओं को गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित माहौल में शिक्षा देना था। लेकिन शिवपुर के इस विद्यालय की हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है। छात्राओं के आरोपों ने पूरे सिस्टम की नींव हिलाकर रख दी है:

  • गुणवत्ताविहीन और अस्वच्छ भोजन: मेस में परोसा जाने वाला खाना ऐसा है जिसे शायद जिम्मेदार अधिकारी एक निवाला भी न चख सकें। समय पर भोजन न मिलना और अस्वास्थ्यकर परिस्थितियां बच्चों के स्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ हैं।
  • पेयजल संकट और गंदगी का अंबार: हॉस्टल के कमरों से लेकर शौचालयों तक की बदहाली और पीने के पानी का अभाव यह साबित करता है कि मेंटेनेंस के नाम पर आने वाला बजट किस तरह कागजों में खप रहा है।
  • प्रिंसिपल और प्रबंधन की तानाशाही: छात्राओं का स्पष्ट कहना है कि जब-जब उन्होंने अपनी समस्याएं उठाने की कोशिश की, उन्हें सुधार के बजाय फटकार और उपेक्षा ही मिली। संवादहीनता और तानाशाही रवैये ने हॉस्टल को शिक्षा मंदिर के बजाय एक यातना गृह में तब्दील कर दिया।

सवाल सिर्फ अव्यवस्था का नहीं, सिस्टम के बहरेपन का है!

​हॉस्टल में अव्यवस्था होना एक पक्ष है, लेकिन उससे भी ज्यादा खौफनाक है प्रशासनिक संवादहीनता

  • ​आखिर क्या वजह है कि बच्चों की छोटी-छोटी शिकायतों की सुनवाई संस्था के भीतर नहीं हो पाती?
  • ​क्यों एक मासूम छात्र/छात्रा को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए सीधे कलेक्ट्रेट का रुख करना पड़ता है?
  • ​क्या जिला स्तर और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों के पास आवासीय विद्यालयों के नियमित और निष्पक्ष निरीक्षण का समय नहीं है?

​30 किलोमीटर की यह पैदल यात्रा इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि विद्यालय स्तर पर शिकायतों के निवारण का ढांचा पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। जब अंदर के सारे दरवाजे बंद हो गए, तब इन बच्चियों ने सड़कों का सहारा लिया।

कलेक्ट्रेट की चौखट पर न्याय की आस: अब कथनी नहीं, सीधी कार्रवाई चाहिए

​छात्राओं ने अंबिकापुर पहुंचकर साफ शब्दों में संदेश दे दिया है—अब खोखले आश्वासन नहीं चलेंगे। उनकी मांगें बिल्कुल स्पष्ट और जायज हैं:

  1. उच्चस्तरीय जांच दल का गठन: मामले की लीपापोती करने के बजाय किसी स्वतंत्र और जिम्मेदार अधिकारी की निगरानी में पूरे मामले की समयबद्ध जांच हो।
  2. प्रिंसिपल व दोषियों पर त्वरित निलंबन व कार्रवाई: जो अधिकारी बच्चों की बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज करते हैं और तानाशाही रवैया अपनाते हैं, उन पर कठोर प्रशासनिक व अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
  3. सुविधाओं की गारंटी: हॉस्टल में भोजन, सुरक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता की तत्काल व्यवस्था की जाए।

निष्कर्ष: कागजी दावों से इतर धरातल पर सुधार की सख्त जरूरत

​शिवपुर एकलव्य स्कूल की छात्राओं का यह साहसिक कदम समूचे सरगुजा संभाग और राज्य के जनजाति विकास विभाग के लिए एक चेतावनी है। यदि 30 किलोमीटर चलने के बाद भी इन बच्चियों को केवल “जांच का आश्वासन” देकर मामला शांत करा दिया गया, तो यह प्रशासनिक विफलता का पराकाष्ठा होगी।

​यह समय महज एक फाइल तैयार करने का नहीं, बल्कि नजीर पेश करने का है—ताकि भविष्य में किसी भी आवासीय विद्यालय का प्रबंधन बच्चों को इस हद तक मजबूर करने की जुर्रत न कर सके!

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