तबेले में पाठशाला

विशेष रिपोर्टर – शशिकांत सनसनी, गरियाबंद । गरियाबंद जिले के आदिवासी विकासखंड मैनपुर के मोतिपानी गांव में मासूम बच्चे बीते दो साल से तबेले में बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। कक्षा पहली से लेकर पांचवी तक के बच्चों की यह मजबूरी प्रशासन की लापरवाही को उजागर कर रही है। शिक्षा का मंदिर, अब तबेला बन चुका है… लेकिन जिम्मेदार अब भी चुप हैं। तस्वीर देखिए गरियाबंद जिले के मोतिपानी प्राथमिकशाला की… जहाँ पर पढ़ाई का केंद्र बना है एक तबेला। जी हां, पिछले दो सालों से ये मासूम बच्चे इसी तबेले में बैठकर अपना भविष्य गढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।

स्कूल भवन की हालत जर्जर होने के कारण नया भवन 10 लाख की लागत से मंजूर तो हुआ, लेकिन निर्माण आज तक अधूरा है। पहले बच्चे पेड़ के नीचे पढ़ाई करते थे, अब उनके नसीब में आया है यह तबेला। बड़ा सवाल यह है कि जब प्रदेश में डबल इंजन की सरकार है, विकास की रफ्तार दोगुनी कही जा रही है — तो शिक्षा जैसे मूलभूत अधिकार पर यह उपेक्षा क्यों? प्रशासन मौन है, शिक्षा विभाग बेखबर, और बच्चे… तबेले में बैठे इंतज़ार कर रहे हैं — एक स्कूल भवन का, एक बेहतर भविष्य का।

छात्रा – “हम रोज़ तबेले में पढ़ाई करते हैं… धूल और बदबू में बैठना पड़ता है…” छात्र – “बारिश के समय पानी टपकता है… बैठने की जगह नहीं होती…” छात्रा – “हमें नया स्कूल चाहिए… ताकि ठीक से पढ़ाई कर सकें…” रामचरण यादव, प्रधान पाठक, प्राथमिक शाला मोतिपानी – “भवन निर्माण दो साल से अधूरा पड़ा है… कई बार शिकायत कर चुके हैं, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं हो रही…” जनक ध्रुव, विधायक, बिंद्रानवागढ़ – “प्रशासन की घोर लापरवाही है… सरकार ने फंड दिया लेकिन जिम्मेदार अधिकारी लापरवाह हैं… बच्चों को तबेले में पढ़ाई करना पड़ रहा है, यह बेहद शर्मनाक है…”

एक ओर सरकार स्कूल चलो अभियान और युक्तिकरण की बातें कर रही है, वहीं दूसरी ओर हकीकत यह है कि स्कूल भवन अधूरे हैं और बच्चे तबेले में पढ़ने को मजबूर हैं। सवाल यही है कि क्या ये बच्चे एक बेहतर भविष्य के हकदार नहीं हैं? और क्या तब तक पढ़ाई रुकेगी, जब तक भवन बन नहीं जाता? या जिम्मेदारों की नींद खुल नहीं जाती?

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