महान वैज्ञानिक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के व्यक्तित्व पर परिचर्चा का आयोजन

✍️ “छत्तीसगढ़ 24 न्यूज़” ब्यूरो चीफ सैयद बरकत अली की रिपोर्ट

गरियाबंद : शासकीय राजीव लोचन स्नातकोत्तर महाविद्यालय राजिम इस वर्ष को स्वर्ण जयंती वर्ष के रूप में मना रहा है, इसी परिपेक्ष्य में महाविद्यालय में नैक व एनएसएस के संयुक्त तत्वावधान में पद्म भूषण, पद्म विभूषण, भारत रत्न सम्मानित तथा भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का जन्म दिवस मनाया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ संस्था प्रमुख डॉ सी एल देवांगन के द्वारा सरस्वती माता के सम्मुख दीप व कलाम जी के छाया चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन करते हुए किया गया। उन्होंने कहा कि डॉ एपीजे अब्दुल कलाम को बचपन से ही परिस्थितियों ने आत्मनिर्भर बना दिया था। उन्हें विद्यार्थियों से विशेष प्रेम था जिसे देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने उनके जन्मदिवस को ‘विद्यार्थी दिवस’ के रूप में मनाने का निर्णय लिया | देश के कल्याण के लिए डॉ कलाम ने जो योगदान दिया, उसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। एक टीचर, वैज्ञानिक और राष्ट्रपति के रूप में एपीजे अब्दुल कलाम ने अपनी पूरी जिंदगी मेहनत और लोगों की सेवा में लगा दी थी।

डॉ. समीक्षा चंद्राकर ने कहा कि अब्दुल कलाम जी को बैलेस्टिक मिसाइल और प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी के विकास के कार्यों के लिए पूरे भारत में मिसाइल मैन के रूप में जाना जाता है। तत्पश्चात प्रो. आकाश बाघमारे ने कहा कि डॉ. अब्दुल कलाम जी आज के सभी युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत है | परमाणु हथियार कार्यक्रमों में सम्मिलित होने कारण डॉ.अब्दुल कलाम जी को भारत का सर्वाेच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न प्रदान किया गया था। किसी भी चीज को सीखने के लिए वह हमेशा तैयार रहते थे और घंटों पढ़ाई किया करते थे। गणित विषय इनका मुख्य रूचि का विषय था।

डॉ. देवेंद देवांगन ने कहा कि चमत्कारिक प्रतिभा के धनी डॉ. कलाम का व्यक्तित्व इतना उन्नत है कि वह सभी धर्म, जाति एवं सम्प्रदायों के व्यक्ति नज़र आते हैं। वे एक ऐसे सर्वस्वीकार्य भारतीय हैं जो देश के सभी वर्गों के लिए ‘एक आदर्श’ बन चुके हैं। विज्ञान की दुनिया से होकर देश का प्रथम नागरिक बनना कोई कपोल-कल्पना नहीं है बल्कि यह एक जीवित प्रणेता की सत्यकथा है।

प्रो. राजेश बघेल ने बताया कि डॉ. कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम् कस्बे में एक मध्यमवर्गीय तमिल परिवार में हुआ था। इनके पिताजी एक स्थानीय ठेकेदार के साथ मिलकर लकड़ी की नौकाएँ बनाने का काम करते थे जो हिन्दू तीर्थयात्रियों को रामेश्वरम् से धनुषकोटि ले जाती थीं। डॉ. कलाम को अपने पिताजी से विरासत के रूप में ईमानदारी और आत्मानुशासन, तथा माँ से ईश्वर में विश्वास और करुणा का भाव मिला।

इस कार्यक्रम में महाविद्यालय के प्रो. एम. एल. वर्मा, डॉ. गोवर्धन यदु, डॉ. समीक्षा चंद्राकर, प्रो. चित्रा खोटे, प्रो. क्षमाशिल्पा मसीह, प्रो. भानु प्रताप नायक, प्रो. मुकेश कुर्रे, प्रो. आकाश बाघमारे, प्रो. राजेश बघेल, डॉ. देवेंद्र देवांगन, एनसीसी अधिकारी कैप्टन दुष्यंत ध्रुवा एवं महाविद्यालय के छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।

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