शशिकांत सनसनी छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के गरियाबंद के घने जंगलों में छिपी 8 लाख की इनामी नक्सली कमांडर ऊषा उर्फ संगीता के लिए अब बंदूक नहीं, बल्कि मां की गूंज रही पुकार
यह आवाज किसी सुरक्षा बल की नहीं, बल्कि एक बूढ़ी मां की सिसकी, एक भाई की आस और एक परिवार की टूटती उम्मीद की है।
ऊषा… लौट आओ।
तुम्हारी मां आज भी रास्ता देख रही है,
तुम्हारा भाई आज भी हर आहट पर चौंक जाता है।
और सिर्फ ऊषा ही नहीं—
इनामी नक्सली बलदेव के परिवार ने भी साफ कह दिया है—
अब बहुत हो गया… घर लौट आओ, वरना बहुत देर हो जाएगी।
गरियाबंद के ये जंगल अब सिर्फ गोलियों की गूंज नहीं,
बल्कि ममता की सिसकियों के गवाह बन रहे हैं।
तेलंगाना के सैंड्रावेली गांव की एक कच्ची दीवार के पीछे बैठी मां मल्लाम की आंखें पथरा चुकी हैं।
उसकी बेटी ऊषा आज संगठन की DVCM है,
लेकिन मां के लिए वह आज भी सिर्फ उसकी गुमशुदा बेटी है।
ऊषा का भाई आबूला गंगैया कैमरे के सामने हाथ जोड़कर अपील करता है—
बहन, अब लौट आओ… मां की हालत ठीक नहीं है।दबाव सिर्फ परिवार का नहीं
यह दबाव सिर्फ परिवार का नहीं है,
बल्कि उन साथियों का भी है जिन्होंने हाल ही में हथियार छोड़ दिए हैं।
24 लाख के तीन इनामी सरेंडर नक्सली—
जानसी (DBCM),सुनील (DBCM)
दीपक (LGS कमांडर)
जो कभी ऊषा और बलदेव के साथ जंगलों में मौत का खेल खेलते थे,
आज सरकार की पुनर्वास नीति के तहत सामान्य जीवन जी रहे हैं। सुनील (आत्मसमर्पित नक्सली)
“हमने नरक छोड़ दिया है…
ऊषा, बलदेव—अब लौट आओ। जानसी (आत्मसमर्पित नक्सली)
“सरकार सम्मान दे रही है,
ये आखिरी मौका है।”
बाइट 3– दीपक (LGS कमांडर)
“जंगल में सिर्फ मौत है…
घर लौटो, जीवन बचाओ।प्रशासन की डेडलाइन सिर पर है।
गरियाबंद–नुवापाड़ा डिवीजन में सक्रिय
ऊषा, बलदेव, अंजू और ज्योति—
इन चार बड़े नामों के पास अब समय बहुत कम बचा है।
सुरक्षाबलों का घेरा तेजी से छोटा होता जा रहा है।
परिजनों को डर है कि अगर इस डेडलाइन से पहले सरेंडर नहीं हुआ,
तो अंजाम बहुत भयानक हो सकता है।यह सिर्फ एक नक्सली के आत्मसमर्पण की कहानी नहीं…
यह एक मां की आखिरी उम्मीद,
एक परिवार के फिर से जुड़ने की पुकार है।
अब सवाल यही है—
क्या ममता की यह आवाज, नक्सल की कठोर दुनिया को तोड़ पाएगी?
क्या ऊषा और बलदेव घर वापसी का रास्ता चुनेंगे?




