Cg24News-R :- आधुनिक समाज में अपराध व हिंसा के विभिन्न रूपों का विस्तार हो रहा है जिसमें मानव तस्करी सबसे भयावह व त्रासदी पूर्ण अपराध है।यह घृणित व्यापार है। इसमें कई तरह के अपराध शामिल हैं। अंग व्यापार, बच्चों से पशुवत कार्य , देह व्यापार , बन्धक मजदरी आदि के लिए महिलाओं बच्चों व पुरूषों के अपहरण व बेचे जाने के मामले लगातार तेजी से बढ़ रहे हैं। हाल ही में छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों में बच्चों के अपहरण के मामले सामने आ रहे हैं। इस भयावह अपराध का चौतरफा विरोध होना चाहिए। सरकार इस तरह की अमानवीयता व क्रूर अपराधों पर शीघ्र ही अंकुश लगाए।
देश में मानव तस्करी बहुत बड़ी समस्या बन चुका है जिसका संबंध विदेशों से है। यह अनैतिक उद्योग का रूप ले चुका है। गरीबी, बेरोजगारी, पिछड़ापन, अशिक्षा व पलायन इस समस्या के मूल में है। इन मामलों में गरीबी व मजबूरी का फायदा उठाकर युवतियों को दिल दहला देने वाले यौन अपराध व यौन शोषण का शिकार बनाते हैं। पीड़ितों
में 92 फीसदी महिलाएं व बच्चे शामिल होते हैं। गोद लेने की आड़ में भी बच्चों का अपहरण होता है।
गौरतलब है इतिहास गवाह है कि पत्थर दिल इंसानों को भी बच्चों के सहज सरल व्यवहार ने द्रवित कर दिया व उनका हृदय व परिवर्तन हो गया।लेकिन बच्चों के अपहरण व मानव तस्करी में सक्रिय लोगों के संवेदनाहीनता व क्रूरता की पराकाष्ठा है जो मासूमों के शरीर से अंग निकालने, हत्याएँ, बालिकाओं व किशोरियों से अनैतिक कृत्य व अन्य भयावह अपराधों को अंजाम देते हैं। यह विडम्बना ही है कि ममतामयी, वात्सल्यमयी, प्रेम की प्रतिपूर्ति कई महिलाएं भी बच्चों की चोरी मानव तस्करी में सक्रिय हैं। महिलाओं का इस तरह असंवेदनशील क्रूर व गम्भीर अपराधों में शामिल होना घटते मानवीय संवेदना का सूचक है जो दुर्भाग्य पूर्ण है। विचारणीय है कि आपराधिक कृत्यों के कारण महिलाओं की जेलों में संख्या बढ़ रही है जो चिन्ताजनक है। जिस समाज में पशुओं से लेकर इंसानों तक के बच्चों के प्रति वात्सल्य, स्नेह की भावना पैदा हो वहां बच्चों के अंग तस्करी जैसे कार्य दुर्भाग्यपूर्ण है।
जिस संस्कृति में दूसरों के शरीर की रक्षा की महिमा का बखान किया गया हो उस समाज में देह व्यापार , अंग व्यापार व अन्य निर्दयता पूर्ण अपराध संवेदनाहीनता का परिचायक है। इन मामलों से जुड़े लोग अनाथ व बेसहारा बच्चों को आसानी से अपना शिकार बनाते हैं जो जीवन भर सुरक्षा को लेकर जुझते हैं। उनका जीवन शुरू होने से पहले ही त्रासदी व कष्ट में बदल जाता है। मानव तस्करी अपराधजनित मनोविकार है जिससे ग्रस्त लोग इन अपराधों को अंजाम दे रहे हैं। जहाँ एक तरफ आधुनिकता और विकास के नए कीर्तिमान कायम किए जा रहे हैं वहीं आधुनिक टेक्नोलॉजी व इतने कड़े कानून के बाद भी इन भयावह अपराधों के कारण मासूमों का अपहरण, अंग हटाना व हत्याएँ हो रही हैं तो इस बात पर चिन्तन आवश्यक हो जाता है कि तमाम विकास की नीतियों व विकास के इतने लम्बे सफर में हमारी सफलता इतने दुखद क्यों है। कुछ बुद्धिमानों व शिक्षित लोगों नें भी अंग निकालने व मानव तस्करी में सहयोग देकर व्यापक जनहानि पहुंचाई है। ऐसा विकास अधिक मायने नहीं रखता जहाँ मानवीय मूल्यों का कोई स्थान न हो।
छत्तीसगढ़ में भी मानव तस्करी के मामले अत्यंत चिन्ताजनक हैं। यहाँ आए दिन गाँवों व शहरों में बच्चों के चोरी के मामले लगातार तेजी से सामने आ रहे हैं। एक आंकड़े के अनुसार मानव तस्करी में छत्तीसगढ़ देश के शीर्ष 5 राज्यों में शामिल है। यह समाज व सरकार के लिए चिंता का विषय होना चाहिए।
इन संवेदनाहीन व अमानवीय अपराधों को रोकने के लिए सरकार को प्रतिबद्ध होना चाहिए। विशेष रणनीति व समुचित समाधान खोजकर ही इस समस्या का समाधान सम्भव हो सकेगा। गरीबी दूर करने वाले सभी व्यवहारिक उपाय उपयोग में लाये जाने चाहिए। बाल मजदूरी के उन्मूलन की भी जरूरत है। पीड़ितों को रोजगार प्रदान कर उनके आर्थिक, शैक्षणिक व सामाजिक उत्थान किया जाना चाहिए। उनके उत्थान के लिए अनेक योजनाओं को प्रारम्भ किया जाना चाहिए जिससे उनके जीवन पर सकारात्मक प्रभाव दिख सके। कानून व्यवस्था के साथ-साथ व्यक्तित्व निर्माण व मानव जीवन मूल्यों के विकास पर ध्यान नहीं दिया जाएगा तब तक समाज में ऐसे अपराधों को खत्म करना मुश्किल होगा। यह आपराधिक मामला जितना सरकार प्रशासन कानून व्यवस्था का है उतना ही समाज सुधार का भी है। बच्चों के अपहरण व मानव तस्करी के स्थायी व पूर्ण समाधान के लिए मनुष्य के मानवीय सद्गुणों दया, प्रेम, करूणा ,आत्मीयता ,संवेदना व सहिष्णुता आदि गुणों को विकसित करने की जरूरत है।इससे शान्ति पूर्ण व अपराधमुक्त समाज का निर्माण हो सकत है। पीड़ितों के संरक्षण व पुनर्वास की जरुरत है। साथ ही पीड़ितों को सम्मान से जीने लायक स्थिति में लाया जाए। सरकारों को भावनात्मक व अन्य मुद्दों के अलावा महिलाओं व बच्चों की शान्ति व सुरक्षा के मुद्दों पर ध्यान देने की जरूरत है।
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डॉ. बिजेंद सिन्हा जी का संपादकीय लेख “सामाज का कलंक एवं अमानवीयता का परिचायक है बच्चों का अपहरण”।



