बाबू गायब, जुगाड़ के भरोसे राजस्व विभाग!
तहसील से एसडीएम कार्यालय तक कर्मचारियों का टोटा, दैनिक वेतनभोगियों के भरोसे महत्वपूर्ण कामकाज
फाइलें अटकीं तो जनता परेशान—कौन लेगा जिम्मेदारी? स्वीकृत पद, रिक्त पद और लंबित प्रकरणों का हिसाब सार्वजनिक करने की मांग
पाटन । विधानसभा क्षेत्र के महत्वपूर्ण राजस्व कार्यालयों में कर्मचारियों की कमी अब महज प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि आम जनता के लिए परेशानी का बड़ा कारण बनती जा रही है। तहसील पाटन, जामगांव आर कार्यालय और एसडीएम कार्यालय में पर्याप्त लिपिकीय अमला नहीं होने की स्थिति में कामकाज प्रभावित होने की बात सामने आ रही है। आरोप है कि नियमित कर्मचारियों की कमी के बीच दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के सहारे कार्यालयीन व्यवस्था को आगे बढ़ाया जा रहा है।
राजस्व विभाग में जमीन, नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन, रिकॉर्ड दुरुस्ती सहित महत्वपूर्ण मामलों की फाइलें प्रक्रिया से गुजरती हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब नियमित अमला ही पर्याप्त नहीं है तो हजारों लोगों से जुड़े राजस्व मामलों की निगरानी और समयबद्ध निराकरण आखिर कैसे सुनिश्चित किया जा रहा है?
‘जुगाड़’ से चल रहा सिस्टम तो जवाबदेही किसकी?
सबसे गंभीर सवाल यही है कि यदि कर्मचारियों की कमी लंबे समय से बनी हुई है और अस्थायी कर्मचारियों के सहारे काम चलाया जा रहा है, तो जिम्मेदार विभाग ने स्थायी समाधान के लिए क्या कदम उठाए?
क्या रिक्त पदों की जानकारी शासन को भेजी गई?
क्या अतिरिक्त कर्मचारियों की मांग की गई?
कितने प्रकरण लंबित हैं?
कितने प्रकरण निर्धारित समयसीमा से बाहर हैं?
और देरी के लिए जिम्मेदार कौन है?
इन सवालों का जवाब जनता को मिलना चाहिए।
फाइलों की रफ्तार पर लगा ब्रेक, चक्कर काट रही जनता
राजस्व कार्यालयों में काम कराने पहुंचने वाले ग्रामीणों को अपने प्रकरणों के लिए बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कर्मचारी कम हैं तो काम का दबाव बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन इसका खामियाजा आम नागरिकों को भुगतना पड़े, यह किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
जिस कार्यालय में जनता अपनी जमीन और अधिकार से जुड़े मामलों के समाधान की उम्मीद लेकर पहुंचती है, वहीं यदि फाइलें कर्मचारी संकट में उलझ जाएं तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की गंभीर विफलता का संकेत है।
रिक्त पदों का हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं?
अब सबसे बड़ा सवाल पारदर्शिता का है। प्रशासन को सार्वजनिक करना चाहिए कि तहसील पाटन, जामगांव आर और एसडीएम कार्यालय में कितने लिपिकीय पद स्वीकृत हैं, इनमें कितने पद भरे हैं और कितने लंबे समय से रिक्त हैं।
साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि वर्तमान में कितने दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी कार्यरत हैं और उनसे किस प्रकार के कार्य लिए जा रहे हैं।
जांच हुई तो सामने आ सकती है पूरी तस्वीर
यदि कर्मचारियों की कमी के कारण राजस्व प्रकरणों के निराकरण में देरी हो रही है तो इसकी प्रशासनिक समीक्षा जरूरी है। रिक्त पदों से लेकर लंबित प्रकरणों और अस्थायी कर्मचारियों की भूमिका तक पूरी व्यवस्था की जांच की जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि समस्या केवल कर्मचारियों की कमी है या व्यवस्था के स्तर पर भी कहीं गंभीर लापरवाही हो रही है।
अब सवाल सीधे प्रशासन से
पाटन की जनता जानना चाहती है—
– तहसील पाटन में कितने बाबुओं के पद स्वीकृत हैं और कितने खाली हैं?
– जामगांव आर कार्यालय की वास्तविक कर्मचारी स्थिति क्या है?
– एसडीएम कार्यालय में कितने लिपिकीय कर्मचारी पदस्थ हैं?
– कितने राजस्व प्रकरण वर्तमान में लंबित हैं?
– कितने प्रकरण निर्धारित समयसीमा पार कर चुके हैं?
– दैनिक वेतनभोगियों से कौन-कौन से कार्य लिए जा रहे हैं?
– कर्मचारियों की कमी दूर करने के लिए अब तक क्या कार्रवाई हुई?
– यदि व्यवस्था सुचारु है तो जनता को बार-बार कार्यालय के चक्कर क्यों लगाने पड़ रहे हैं?
अब जरूरत बयान की नहीं, आंकड़े और दस्तावेज सामने रखने की है।
जनता का सवाल—राजस्व तंत्र चलेगा व्यवस्था से या ‘जुगाड़’ से?
राजस्व विभाग सीधे आम आदमी की जमीन और अधिकारों से जुड़ा है। इसलिए यहां ‘काम चलाऊ’ व्यवस्था लंबे समय तक नहीं चल सकती। प्रशासन को तत्काल कर्मचारियों की स्थिति की समीक्षा कर आवश्यक पदों पर नियमित अमला उपलब्ध कराना चाहिए और लंबित प्रकरणों की समयबद्ध समीक्षा करनी चाहिए।
वरना सवाल उठता रहेगा—बाबुओं की कमी सिर्फ संयोग है या वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम?






