महाभारत के ‘भीम’ की माली हालत खराब, जैसे-तैसे पाल रहे हैं पेट, सरकार ने कर ली है आँखे बंद

देश और राज्य का नाम रोशन करने वाले ‘भीम’ प्रवीण की आर्थिक स्थिति है बहुत खराब, दो बार ओलंपिक, एशियन, कॉमनवेल्थ में कई गोल्ड, सिल्वर मेडल जीते चुके है ‘भीम’ फिर भी मदद के लिए सरकार की आंखे बंद

“छत्तीसगढ़ 24 न्यूज़” आईना हकीकत का .. क्यों होता है खिलाडी और कलाकार – सरकार की उपेक्षा का शिकार  

प्रवीण कुमार सोबती उर्फ़ ‘महाभारत’ के ‘भीम’ को 1967 में खेल के सर्वोच्च पुरुस्कार ‘अर्जुन अवॉर्ड’ से भी नवाजा गया है

मुंबई- आपको ज्ञात होगा की हमारे देश में रामायण के बाद दूरदर्शन का सबसे लोकप्रिय धारावाहिक ‘महाभारत’ था जो पिछले साल 2020 में कोरोना महामारी के लॉकडाउन के दौरान रामायण और महाभारत दूरदर्शन पर फिर से दिखाया गया था, जिसके बाद दर्शकों में एक बार फिर से ‘महाभारत’ के कैरेक्टर/कलाकारों की चर्चा होने लगी थी. महाभारत के बारे में सोचते हुए लोगों के दिमाग में ‘गदाधारी भीम’ का चेहरा एक बार सामने जरूर आता है। महाभारत के ‘गदाधारी भीम’ का किरदार देश के लिए ओलंपिक, एशियन, कॉमनवेल्थ में कई गोल्ड, सिल्वर मेडल जितने वाले प्रवीण कुमार सोबती ने निभाया था। प्रवीण कुमार सोबती सिर्फ एक बेहतरीन कलाकार ही नहीं बल्कि शानदार खिलाड़ी भी थे।

देश और राज्य का नाम रोशन करने वाले ‘भीम’ की आर्थिक स्थिति है बहुत खराब

दो बार ओलंपिक मेडल जीत चुके ‘भीम’ प्रवीण की आज आर्थिक स्थिति बहुत खराब है, उनकी माली हालत लगातार बिगड़ती जा रही है। किसी भी तरह से वो अपना गुजारा कर रहे हैं। अब प्रवीण कुमार ने सरकार से और समाजसेवकों से अपनी पेंशन और आर्थिक मदद की गुजारिश कर रहे हैं।



प्रवीण कुमार-दो बार ओलंपिक, एशियन, कॉमनवेल्थ में कई गोल्ड, सिल्वर मेडल जीते हैं

प्रवीण कुमार सोबती का कहना है कि उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। बहुत मुश्किल से वह अपना गुजारा कर रहे हैं। प्रवीण कुमार सोबती ने दो बार ओलंपिक, एशियन, कॉमनवेल्थ में कई गोल्ड, सिल्वर मेडल जीते हैं। प्रवीण कुमार सोबती को 1967 में खेल के सर्वोच्च पुरुस्कार ‘अर्जुन अवॉर्ड’ से भी नवाजा गया है। लेकिन बाकी खिलाड़ियों की तरह पंजाब के रहने वाले प्रवीण कुमार सोबती को किसी भी सरकार ने पेंशन नहीं दी है। असल में पंजाब में ओलंपिक मेडल लाने वाले खिलाड़ियों को पेंशन दी जाती है, लेकिन प्रवीण का कहना है कि उन्हें नहीं मिल रही है। इसलिए वह पेंशन की गुजारिश कर रहे हैं।

रिश्ते/शुभचिंतक, सिर्फ नाम के नहीं दे रहा कोई मेरा साथ

एनबीटी में छपी रिपोर्ट के मुताबिक प्रवीण कुमार सोबती ने कहा कि इस कोरोना लॉकडाउन के दौरान उनकी हालात और भी ज्यादा खराब हो गई है। प्रवीण ने कहा कि उन्होंने लॉकडाउन के दौरान अपने कई रिश्तेदारों से मदद मांगी लेकिन किसी ने भी उनका साथ नहीं दिया। यहां तक की स्वयं को मेरा शुभचिंतक बताने वाले नेता भी नहीं दे रहा मेरा साथ. प्रवीण ने कहा, ये सारे रिश्तेनाते खोखले हैं. सहारा देने के वक्त सब साथ छोड़ देते हैं।

‘मैं 76 साल का हूँ मुझे स्पाइनल की परेशानी है 

मीडया से चर्चा करते हुए प्रवीण ने कहा की ”मैं 76 साल का हूं लेकिन काफी वक्त से घर में हूं…तबीयत भी बहुत खराब रहती है। मुझे स्पाइनल की परेशानी भी है। घर पर पत्नी है वो मेरा ख्याल रखती है। एक बेटी की मुंबई में शादी हो गई, उस दौरान भीम को सब जानते थे लेकिन अब सब भूल गए हैं।



‘सभी खिलाड़ियों को दिया पेंशन लेकिन मुझे करदिया नजरअंदाज

प्रवीण ने कहा, ”पंजाब में आज तक जितनी भी सरकारें आई हैं, मुझे उन सभी से शिकायत है क्योंकि एशियन गेम्स या मेडल जीतने वाले हर खिलाड़ी को पंजाब की सरकार की ओर से पेंशन दी गई है लेकिन मुझे इससे वंचित रखा गया है। जबकि मैंने सबसे अधिक गोल्ड मेडल जीते हैं। मैं एक अकेला ऐसा एथलीट था, जिसने कॉमनवेल्थ को रिप्रेजेंट किया था। फिर भी पेंशन देने के मामले में मुझे नजरअंदाज किया गया है। मैं अभी बीएसएफ से मिल रही पेंशन से जैसे-तैसे गुजारा कर रहा हूं।”

कैसे बना प्रवीण ‘महाभारत का भीम’

प्रवीण ने कहा, ”ये 1986 की बात है, जब मुझे मेरे खेल के लिए बीएसएफ में डिप्टी कमांडेंट की नौकरी भी मिल गई थी। इसी दौरान एक दिन अचानक मुझे पता चला कि बीआर चोपड़ा महाभारत बना रहे हैं और वो भीम के किरदार के मुझे लेना चाहते हैं। इसके बाद मैं बीआर चोपड़ा से मिला और मुझे भीम का रोल मिल गया। भीम के किरदार में लोगों ने मुझे इतना पसंद किया कि हिंदी फिल्मों के भी ऑफर मिलने लगे थे। 50 से अधिक फिल्म करने का मुझे ऑफर मिला।



अमृतसर के रहने वाले हैं ‘महाभारत के ‘भीम’

बतादे की महाभारत का ‘भीम’ यानी की प्रवीण कुमार सोबती पंजाब के अमृतसर के रहने वाले हैं। प्रवीण कुमार सोबती का जन्म 6 सितंबर 1946 को पंजाब अमृतसर के पास एक सरहली नामक गांव में हुआ था। बचपन से ही प्रवीण शरीर से भारी-भरकम थे। उनकी बॉडी को देखने के बाद स्कूल के हेडमास्टर उन्हें खेलने के लिए प्रोत्साहित करते थे और यहीं से प्रवीण का मन खेल में लग गया।

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