वादों की चमक और हकीकत का अंधेरा
मंत्री लक्ष्मी रजवाड़े जी! आपके ‘सुशासन’ में गरीब बेघर: ग्राम पंचायत कसौड़ा में 2 साल से पीएम आवास पर आंगनवाड़ी का ‘कब्ज़ा’, हितग्राही अपनी ही छत को तरसा!

[भरतपुर / एमसीबी] छत्तीसगढ़ के नवगठित जिले एमसीबी (मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर) के विकासखंड भरतपुर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो महिला एवं बाल विकास विभाग के दावों की धज्जियां उड़ा रही है। ग्राम पंचायत कसौड़ा में सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता का आलम यह है कि एक गरीब ग्रामीण पिछले 2 सालों से अपने खुद के प्रधानमंत्री आवास में रहने के लिए तरस रहा है, क्योंकि वहां आंगनवाड़ी केंद्र संचालित किया जा रहा है।
1. बड़े-बड़े भाषण, लेकिन कसौड़ा की हकीकत से मुंह मोड़े मंत्री
महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी रजवाड़े अक्सर मंचों से महिलाओं और बच्चों के उज्जवल भविष्य के बड़े-बड़े वादे करती नजर आती हैं।
लेकिन सवाल यह उठता है कि पिछले 2 सालों से उनके ही विभाग की नाक के नीचे एक गरीब का हक क्यों छीना जा रहा है? मंत्री जी की यह खामोशी अब कसौड़ा के ग्रामीणों को चुभने लगी है।
2. जर्जर भवन की भेंट चढ़ा गरीब का आशियाना
जानकारी के मुताबिक, कसौड़ा की मूल आंगनवाड़ी का भवन इतना जर्जर हो चुका था कि उसकी छत कभी भी गिर सकती थी। किसी बड़े हादसे के डर से विभाग ने आनन-फानन में बच्चों को एक ग्रामीण के नवनिर्मित पीएम आवास में शिफ्ट कर दिया।
हितग्राही का दर्द: “हमने सोचा था कि पीएम आवास मिलने से सिर पर पक्की छत होगी, लेकिन 2 साल बीत गए और हम आज भी अपने ही घर के बाहर रहने को मजबूर हैं। सरकार बच्चों को पढ़ा रही है, लेकिन हमारे रहने का हक छीन लिया है।”
3. सरपंच की गुहार, पर विधायक और विभाग की नींद नहीं खुली
ग्राम पंचायत कसौड़ा के सरपंच का कहना है कि उन्होंने इस गंभीर समस्या को लेकर विभाग के आला अधिकारियों और क्षेत्रीय विधायक को कई बार अवगत कराया है।
2 साल का लंबा वक्त: क्या 24 महीने का समय एक नया भवन बनाने के लिए काफी नहीं था?
प्रशासनिक लापरवाही: विधायक और मंत्री की चुप्पी यह दर्शाती है कि भरतपुर के सुदूर इलाकों की समस्याओं से उन्हें कोई सरोकार नहीं है।
4. मंत्री लक्ष्मी रजवाड़े से तीखे सवाल:
मंत्री जी, क्या आपका विभाग इतना ‘कंगाल’ हो गया है कि बच्चों को पढ़ाने के लिए एक गरीब का घर छीनना पड़ रहा है?
2 साल की देरी का जिम्मेदार कौन? उन अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी जिन्होंने एक ग्रामीण को उसके घर से वंचित रखा है?
सुरक्षा का क्या? क्या एक निजी आवास में बच्चों को वे तमाम सुविधाएं और सुरक्षा मिल पा रही है, जिसका दावा आप अपने भाषणों में करती हैं?
निष्कर्ष: कब जागेगा सिस्टम?
कसौड़ा का यह मामला केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि एक गरीब के सपनों के साथ खिलवाड़ है। एक तरफ जर्जर आंगनवाड़ी भवन हादसे को दावत दे रहा है, तो दूसरी तरफ ‘सुशासन’ का दावा करने वाली सरकार एक गरीब को उसके घर से दूर रखे हुए है।
हमारा संकल्प: हम इस खबर के माध्यम से प्रशासन को सचेत करते हैं कि यदि जल्द ही कसौड़ा में नए आंगनवाड़ी भवन का निर्माण शुरू नहीं हुआ और हितग्राही को उसका घर वापस नहीं मिला, तो यह मामला बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है।




