डॉ.बिजेंद सिन्हा जी का संपादकीय लेख “बढ़ते तलाक टूटते परिवार से बच्चों का भविष्य अन्धकारमय”।

Cg24News-R :- व्यक्ति के जीवन में परिवार की
भूमिका महत्वपूर्ण है। मानव सभ्यता का विकास परिवार बसाने उसकी आवश्यकता पूरी करने और उसके सदस्यों के विकास की चिंता करने से आरम्भ होती है। गृहस्थ धर्म के शाश्वत महत्व एवं वर्तमान प्रासंगिकता को कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता। विवाह हमारे सभी संस्कारों में एक संस्कार है। परिवार के भरे-पूरे इस माहौल में प्रेम त्याग सहयोग आज्ञापालन व अनुशासन जैसे गुणों का अभ्यास एक सुखद व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
शिव जी के अर्द्धनारीश्वर स्वरूप भी स्त्री- पुरुष के
एक-दूसरे के पूरक होने का संकेत देता है। विवाह से मनुष्य समाज का एक अंग बनता है। अपूर्णता से पूर्णता प्राप्त करता है। निर्बलता से सबलता की ओर अग्रसर होता है। उसे नये संबंध प्राप्त होते हैं ,नये उत्तरदायित्व और नये आनंद प्राप्त होते हैं । गृहस्थ में प्रविष्ट न होने वाला व्यक्ति अनेक प्रकार के मानसिक व शारीरिक रोगों का शिकार बनता है। आधुनिकता के प्रभाव के चलते बिना शादी के, सिंगल रहने की अवधारणा भी पनप रही है। परिवार के भरे-पूरे माहौल में बच्चों को उत्तम संस्कार मिल जाते हैं। परन्तु वर्तमान समय में परिवार संस्था विकट दौर से गुजर रही है। संयुक्त परिवार निरन्तर कम होते जा रहे हैं। जिम्मेदार,प्रभावशाली व हाई सोसाइटी परिवारों में भी तलाक के मामले बढ़े हैं। इस पारिवारिक विघटन की झलक हम बढ़ते हुए तलाक़ की संख्या से देख सकते हैं। गौरतलब है चूँकि भारतीय दर्शन व वैवाहिक, पारिवारिक व्यवस्था में तलाक देने का प्रचलन ही नहीं है। इसलिए हिन्दी में ‘ तलाक ‘शब्द का आविर्भाव ही नहीं हुआ है।
‘तलाक ‘हिन्दी भाषा का शब्द नहीं है।’तलाक’ अरबी का शब्द है।
यौन- संबंधों की उच्छृंखलता व सारी मर्यादाओं को पार कर देने वाली उच्छृंखलता ने पारिवारिक मूल्यों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है। निश्चित ही सामाजिक जकड़न कम होना चाहिए लेकिन मानवीय गरिमा का उल्लंघन भी नहीं होना चाहिए। पारिवारिक विघटन की सबसे बड़ी वजह जीवन का विलासी बनते चले जाना है। आधुनिक शहरों में परिवार परिवारों के टूटने-बिखरने का दौर वहाँ की उपभोक्तावादी संस्कृति से शुरू हुआ। मौलिक अधिकारों की आड़ में व्यक्तिगत स्वतंत्रता, उन्मुक्तता व उच्छृंखलता के चलते परिवार संस्था का अंतहीन टूटन का सिलसिला चल पड़ा। मौजूदा दौर में पारिवारिक मूल्यों व नैतिक जीवन चर्या के स्तर में गिरावट आई है। लिव इन रिलेशनशिप इन्हीं घटते पारिवारिक मूल्यों का परिचायक है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता की आड़ में यह व्यवस्था मानवीय गरिमा व पारिवारिक मूल्यों का उल्लंघन है जो अपनी संस्कृति के विरुद्ध अप संस्कृति को जन्म देती है। बढ़ते तलाक के कारणों में आपसी समझ की कमी, महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता , बदलते सामाजिक मूल्य, कामकाजी जीवन का दबाव, सोशल मीडिया का प्रभाव, संयुक्त परिवार से अलग रहने की चाहत, पारिवारिक दबाव, कम उम्र,या अधिक उम्र में शादी,नशाखोरी, अविश्वास, लाइफ पार्टनर का अलग-अलग स्थानों पर रहना,परस्पर अहंकार का टकराव, सामन्जस्य की कमी, अधिक खुलापन भी तलाक के कारणों में से है।
शारीरिक या यौन असन्तोष भी तलाक का महत्वपूर्ण कारण है। शहरीकरण और व्यस्त जीवनशैली के कारण
लाइफ पार्टनर एक -दूसरे को समय नहीं दे पाते, जिससे दूरियाँ बढ़ती हैं, जिसकी वजह से तलाक होते हैं। मादक पदार्थों की लत वैवाहिक जीवन को तबाह करती हैं। दाम्पत्य जीवन में पद व पैसे का प्रभाव भी तलाक के कारणों में से है। कुछ दम्पत्तियां अपने पति या पत्नी होने का मूल्यांकन अपनी योग्यता पद पैसा व बाहरी व्यक्तित्व से करते हैं।वे दाम्पत्य जीवन में भी पद पैसा व योग्यता के मनोभाव से युक्त रहते हैं।वे अपने इसी व्यक्तित्व को लेकर घर आते हैं और इनका प्रभाव दाम्पत्य जीवन में भी दिखाना चाहते हैं। परिणामस्वरूप परस्पर कटुता व मन मुटाव पनपने लगता है। एक दौर था जब गृहस्थ जीवन धर्म मर्यादा संयम त्याग समर्पण सामन्जस्य व सहनशीलता का परिचायक था। इन गुणों के समावेश से वैवाहिक जीवन सुख समृद्धि और विकास का आधार बन कर चलता था, जिससे गृहस्थ जीवन में आदर्श स्थापित होता था। जहाँ वैवाहिक जीवन में प्रेम व आत्मीयता का विस्तार होता था, जिससे सामाजिक समरसता का आधार भी रहता था लेकिन लिव इन रिलेशनशिप व्यवस्था में सहज, स्वाभाविक प्रेम कम एवं यौन स्वातन्त्र्य व भोगवादी प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। आधुनिक समाज की यह नवीन अवधारणा मानवीय मर्यादाओं का उल्लंघन है। ऐसी अपसंस्कृति वैवाहिक व गृहस्थ जीवन को नष्ट-भ्रष्ट कर रही है। इस तरह का सहजीवन जब मन करे साथ रहो बाद में अलग हो जाने की छूट देता है। तात्पर्य यूज एण्ड थ्रो कल्चर यानि इस्तेमाल करो और फेंक दो की स॔स्कृति को बढ़ावा देता है। उस स्थिति में किसी का किसी प्रति नैतिक दायित्व नहीं बनता। न आपस में न बच्चों के प्रति। ये प्रवृतियां पारिवारिक संकट की द्योतक हैं जो परिवार निर्माण में बाधक है। ऐसे जीवन चर्या से अपराध बढ़ रहे हैं। लिव इन रिलेशनशिप में बच्चों के परवरिश की वैधता जरुर मिल गई है लेकिन इस व्यवस्था में शारीरिक आकर्षण की प्रधानता रहती है व भावनात्मक संबंध कम होते हैं, विवाद की स्थिति रहती है। यानि रिश्ता निभाने के लिए कानून का सहारा लेना पड़ता है। लिव इन रिलेशनशिप में आए दिन आपराधिक काण्ड होते देखा जा सकता है।अति आधुनिकता के बाद भौतिकवाद के साथ पनपा यह पारिवारिक व नैतिक पतन एवं तलाक़ की घटनाएं अब शहरों से गांव की ओर बढ़ रही हैं। तलाक लेना अब सहज हो गया है।तलाक को पारिवारिक, सामाजिक दोष की जगह जीवन का विकल्प माना जाने लगा है। स्पष्ट है कि मानवीय मूल्यों व पारिवारिक मूल्यों को अब पुरानी मान्यता माना जाने लगा है। वर्तमान समय में तलाक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं, जो कि पारिवारिक विघटन का सूचक है।
बीते दिनों तलाक़ के संबंध में माननीय केरल हाईकोर्ट की टिप्पणी आई है कि
यूज एण्ड थ्रो कल्चर यानि इस्तेमाल करो और फेंक दो की स॔स्कृति ने समाज को बर्बाद किया। नई पीढ़ी शादी को बुराई मानती है। वे शादी को हमेशा के लिए चिंता समझती है। जबकि शादी हमेशा के लिए समझदारी का निवेश था। वे लिव इन रिलेशनशिप में रहना ज्यादा पसंद करती हैं। तलाक से बच्चों पर बुरा असर पड़ता है। शादी टूटने से कई जिन्दगीयां बर्बाद होती हैं। जैसी प्रेरणादायक बातें कही हैं।
हाल ही में माननीय सुप्रीम कोर्ट के डिविजन बेंच के कथनानुसार शादी पूरी तरह से टूट जाने जाने के निर्णय से बच्चों पर बुरा असर पड़ता है। जैसी दूरदर्शी व प्रेरणीय बातें कही हैं।ऐसे में पारिवारिक मूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा ही एकमात्र विकल्प बचा है। केरल जैसे समृद्ध व शिक्षित राज्य में तलाक के बढ़ते मामले से स्पष्ट है कि समाज में शैक्षणिक आर्थिक उत्थान के साथ नैतिक उत्थान भी जरूरी है। भौतिकता की अति वृद्धि के बाद तलाक का दुष्परिणाम यह है कि तलाक के बाद बच्चे अपने विकास के साथ जो शारीरिक मानसिक व भावनात्मक कष्ट भोगते हैं, वह समाज में कई सवाल खड़े करते हैं। ये परिस्थितियां मनोरोग विशेषज्ञों के लिए भी शोध का विषय है। न्यायालय में दाम्पत्य संबंधी विवाद के मामले में वृद्धि पारिवारिक मूल्यों में आई गिरावट का प्रमाण है।वहीं पारिवारिक झगड़े मिटाने के लिए परिवार न्यायालय, मेरिज ब्यूरो व परिवार सलाह केन्द्रों की बढ़ती संख्या बताती है कि समाज में पारिवारिक स॔कट बढ़ने लगा है।भौतिकता व उपभोक्तावाद की आंधी हमारी संस्कृति व संस्कारों को ही ध्वस्त करने पर तुली हुई है। आधुनिक जीवनशैली होनी भी चाहिए लेकिन अति आधुनिकता के फेर में हम अपने मूल संस्कारों को ही भूलते जा रहे हैं।हमारे आदर्श एवं मूल्य बिखर रहे हैं। न्युक्लीअर फैमिली यानि एकल परिवार के रूप में घटते पारिवारिक मूल्यों के कारण सर्वाधिक परेशानी वृद्ध स्त्री-पुरुषों को हो रही है। आधुनिक शिक्षित व कथित सभ्य समाज में भी अधिकांश वृद्ध स्त्री-पुरुष वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर हैं, जो घटते मानवीय संवेदना का परिचायक है।तलाक के बाद परित्यक्त स्त्री-पुरुषों की बढ़ती संख्या भी सभ्य समाज के लिए बाधक है जो सामाजिक सुव्यवस्था बनाए रखने के लिए बाधक है।
आज के इस युग में जहाँ संयुक्त परिवार खत्म होने की राह पर है,एकल परिवारों के मध्य टकराव एवं बिखराव स्पष्ट नजर आता है। वहां पर आत्मीयता का व्यापक विस्तार परस्पर स्नेह सहयोग सदाचार एवं विश्वास की पुनर्स्थापना ही उनको टूटने से बचा सकती है, और ऐसा नहीं है कि ये सिद्धांत मात्र वैवाहिक संबंध की नींव को मजबूत करने के लिए कारगर होंगे, बल्कि सत्य तो यह है कि ये ही
सूत्र एक विश्व परिवार की नींव भी सहजता से रख सकते हैं। परिवारों को खड़ा करने में जिन तत्वों को आधार माना गया है, वे ही तत्व देश को व विश्व को भी एकरूपता देने की भूमिका भी अदा कर सकते हैं। संकीर्णता व्यक्तियों को स्वार्थीं व निष्ठुर बनाती हैं तो वहीं अनुदारता एक-दूसरे के प्रति आक्रामकता को दर्शाती है।सत्य यही है कि जिन आदर्शों पर सुखी परिवार का निर्माण होता है, उन्हें भूला देने पर ही व्यक्ति, व्यक्तिगत स्तर पर पतित होता है और समाज भी विघटित व विच्छरंखल होता है। यानि व्यक्ति एकाकी नहीं है बल्कि पारिवारिक व त्थान जिन सद्गुणों पर निर्भर है, वे सुखी परिवार , सुसंस्कृत परिवार से ही मिल सकते हैं। तात्पर्य व्यक्ति का पतन व उत्थान जिन परिस्थितियों का प्रतिफल है, उसके परिवार से मिले वातावरण की देन ही है। परिवार सुखी व संस्कारी हो तो आनन्द उल्लास संतोष से परिपूर्ण परिस्थितियों का निर्माण करते हैं। पति-पत्नी परस्पर सुखी रहते हैं। बच्चे माता-पिता के संरक्षण में संतुष्ट व सुरक्षित महसूस करते हैं। तलाक के कारण जहाँ वृद्ध स्त्री पुरुष को परेशानी होती है, वहीं सुखी व संस्कारी परिवार में घर के बड़े बुजुर्ग सम्मानित अनुभव करते हैं।
भाई-भाई से लेकर बहन-बहन के रिश्ते एक-दूसरे के विकास में सहयोग ही करते हैं। सभी को सुरक्षा संरक्षण पोषण प्रगति सहयोग का अहसास होता है। साथ ही वहां पर अनुशासन उत्तरदायित्व और शिष्टाचार के निर्वहन की ऐसी व्यवस्था बनती है जिससे मनुष्य अपनी गणना महामानवों में करा पाने की स्थिति में होता है। बड़े रूप में जिसे सभ्यता व संस्कृति का नाम दिया जाता है, उसका आरम्भ परिवार की पाठशाला से ही शुरू होता है। परिवार निर्माण मौजूदा परिवेश की महती आवश्यकता है। आदर्श परिवार की पुनर्स्थापना के लिए नैतिक व पारिवारिक शिक्षा की भूमिका महत्वपूर्ण है जिसकी वर्तमान समय में सर्वाधिक आवश्यकता है। मौजूदा दौर में संयम, समझौता, आत्मीय रिश्ता, सहिष्णुता व सामन्जस्य जैसे सद्गुणों की आवश्यकता है जिससे न सिर्फ कलह से मुक्त रह सकते हैं बल्कि परिवार में शांति, समरसता व समृद्धि ला सकते हैं। संस्कारयुक्त परिवार से ही संस्कार युक्त पीढ़ी का निर्माण सम्भव है।पाशुविक प्रवृत्ति के होते जा रहे माहौल के साथ-साथ स्वच्छंद यौनाचार के नियन्त्रण, बच्चों व बुजुर्गों की जिम्मेदारी व सामाजिक सुरक्षा बनाए रखने के लिए प्रधानतया विवाह संस्था को बचाए रखने की आवश्यकता है। दूरगामी भविष्य के लिए पारिवारिक जीवन में सुधार करके संवेदना व संस्कारों को बढ़ावा देकर परिवार निर्माण की ओर एक सामयिक व सार्थक कदम बढ़ा सकते हैं, जिससे समाज व राष्ट्र को सभ्य समृद्धि व शक्तिशाली बनाया जा सके।
आज की विशाद पूर्ण परिस्थितियों में जहाँ अधिकांश वैवाहिक संबंध, विच्छेदों की राह चढ़ रहे हैं , भारतीय संस्कृति के इन सूत्रों को आत्मसात किया जा सके तो परिवार एक ऐसे उद्यान में बदल सकता है जिसकी अनुपम शोभा व सुन्दरता न केवल परिवार के सदस्यों के लिए गर्व – गौरव आधार बन सकती है बल्कि पारिवारिक, सामाजिक शान्ति एवं राष्ट्रीय और वैश्विक प्रगति की स्थापना भी की जा सकती है।
B. R. SAHU CO-EDITOR
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