चुनाव नजदीक आते ही नेताओं को याद आई जनता!
पाँच साल कहाँ थे? अब हर गली-मोहल्ले और गांव में क्यों दिखने लगे नेता?
दिल्ली/पंजाब। चुनाव की आहट तेज होते ही शहरों से लेकर गांवों तक राजनीतिक गतिविधियां बढ़ती दिखाई देने लगी हैं। जो नेता वर्षों तक आम जनता से दूर नजर आते थे, वे अब गलियों, मोहल्लों और गांवों में जाकर लोगों से मुलाकात करते दिखाई दे रहे हैं।
जनता के बीच अब एक बड़ा सवाल उठ रहा है—अगर नेताओं को जनता की समस्याओं की इतनी चिंता है, तो यह चिंता पाँच साल पहले क्यों नहीं दिखाई दी?
सड़कें टूटी हों, नालियां जाम हों, स्ट्रीट लाइट खराब हो, सफाई व्यवस्था चरमराई हो, युवाओं के सामने रोजगार की समस्या हो या गांवों में मूलभूत सुविधाओं की कमी—इन समस्याओं को लेकर जनता लगातार आवाज उठाती रही है। लेकिन चुनाव नजदीक आते ही अचानक नेताओं का जनता के घर-घर और गली-गली पहुंचना लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
जनता का सवाल—सिर्फ चुनाव के समय क्यों?
जनता का कहना है कि जनप्रतिनिधि किसी भी पक्ष के हों या विपक्ष के, उनकी जिम्मेदारी केवल चुनाव के समय जनता के बीच जाना नहीं होनी चाहिए। जनता को पूरे पाँच साल सुना जाना चाहिए। अगर नेता नियमित रूप से जनता के बीच आते, लोगों की समस्याएं सुनते, अधिकारियों तक उनकी आवाज पहुंचाते और समस्याओं के समाधान के लिए लगातार प्रयास करते, तो शायद आज कई समस्याएं इतनी गंभीर नहीं होतीं।
“वोट से पहले वादे नहीं, पाँच साल का हिसाब चाहिए”
अब जनता को केवल चुनावी वादों से ज्यादा काम का हिसाब और जवाबदेही चाहिए। सवाल यह भी है कि चुनाव जीतने के बाद जनता से मिलने का सिलसिला कितने समय तक जारी रहेगा?
जनता अब यह पूछना चाहती है ?
पाँच साल में कितनी बार जनता के बीच आए?
कितनी समस्याएं अधिकारियों तक पहुंचाईं?
कितने काम करवाए?
और चुनाव के बाद भी क्या इसी तरह जनता के बीच रहेंगे?






