डॉ. बिजेन्द सिन्हा जी का संपादकीय लेख, “शीर्ष पर बढ़ते यौन हिंसा के मामले चिन्ता जनक”

जहाँ एक ओर वैज्ञानिक प्रगति,आधुनिकता और विकास के नये कीर्ति मान कायम किये जा रहे हैं मगर दूसरी ओर कई जगहों पर हो रही दुष्कर्म और हत्याएँ ,अशलील वीडियो बनाने की घटनाए अत्यंत चिन्ता जनक है। हत्या, बलात्कार व अन्य अपराध समाज में जीवन मूल्यो के ध्वस्त होने के प्रमाण हैं सामूहिक दुष्कर्म व दुष्कर्म के बाद हत्या या घायल अवस्था में छोड़ देना,अपहरण व मानव तस्करी आम बात हो गयी है।

चिन्ता जनक तथ्य यही है कि सरकार के तमाम दावों के बावजूद भी देश में यौन हिंसा से जुड़े मामलों में अंकुश नहीं लग पा रहा है। यह स्थिति खतरनाक भी है। ऐसे मामलों में समाज के सहयोग की भी जरूरत है। पीडितो को समय पर सुरक्षा व न्याय मिल पाया यह भी उनके हक में बहुत बड़ा सहयोग होगा। छत्तीसगढ़ में भी यौन हिंसा के बढते मामले चिन्ता जनक है। ऐसे अनैतिक व हिन्सक अपराधो के मामले लगा तार तेजी से बढ़ रहे हैं। जो राज्य में अपराधों की तस्वीर प्रस्तुत करती हैं।

नाबालिग लड़कियों पर अनाचार व हिंसा और बच्चों के अपहरण व हत्या हो रहे हैं ,उसे देखते हुए प्रदेश में कानून व्यवस्था का सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है। समाज में न केवल अपराध बढ़ रहे हैं अपितु अराजकता भी फैल रहा है। लिहाजा तत्काल कानून व्यवस्था सुथारने की जरूरत है। बच्चों व नाबालिग बालिकाओं के खिलाफ बढते अपराध की घटनाओं को गम्भीरता से लेने की जरूरत है।हिंसा व्यक्ति को सिर्फ अमानवीय बना सकती है व संवेदनहीनता का परिचायक है। देश में विकास का सारा जोर भौतिक निर्माण पर हो रहा है।

सामाजिक विकास व जीवन मूल्यों के विकास पर गौर करने की जरुरत है नहीं समझी गयी। जो हिंसक घटनाओं में शामिल हो रहे है उन्हें कौन प्रेरित कर रहा है व अपराध के लिए सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक ऐसे कौन से कारण हैं जिन्हें उत्तरदायी माना जाय। जब तक अपराधियों के मनोविज्ञान को समझकर इनके सुधार व दुष्परवृत्ति उन्मूलन का रास्ता नहीं निकाला जा सकता तब तक समाज में बलात्कार आधारित हिंसा को खत्म करना मुश्किल होगा। इन अपराधों के विरुद्ध कंडे कानून है । उसके बावजूद अनाचार व हिंसक घटनाओं के चलते बेटियों को अगर जान गंवानी पड़ रही है तो यह सोचने का वक्त है कि तमाम विकास की नीति यो व समाजिक विकास के इतने लम्बे सफर में हमारी सफलता इतने दुखद क्यों है।

अपराध करने पर अपराधी को सजा देना एक बात है और व्यक्ति अपराध की ओर प्रवृत्ति ही न हो ये दो अलग-अलग बातें हैं। यानि आपराधिक प्रवृत्ति से मुक्त होने की जरूरत है ।अपराध बढ़ने का कारण ही यही है कि सुख सुविधाओं के साथ साथ मनुष्य की आन्तरिक विशालता व नैतिक मूल्यों में वृद्धि नहीं हुई। गौरतलब है कि दुष्कर्म की घटनाओं में नाबालिग व किशोरों की मनमानी चिन्तनीय है। किशोरो के इस अपराध को देखते हुए भावी समाज का स्वरूप कितना दुखद होगा ,इसकी कल्पना की सकती है। शिक्षा प्राप्त करने की उम्र मे आपराधिक कृत्य करना विडम्बना है।

नैतिक व मानवीय उत्थान आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। हमें यह भी सोचना होगा कि उनमें सुसंस्कारिता किस प्रकार स्थिर रहे व निरन्तर बढे। सुसंस्कारिता का पोषण न मिलना भी अपराध का एक कारण है। नैतिक व मानवीय मूल्यों की कमी होने के कारण समाज में क ई तरह की समस्याएं खडी होने लगती हैं। इस ओर उपेक्षा करने से वर्तमान पीढ़ी,नयी पीढ़ी के साथ न्याय नहीं कर सकेगे। इन आस्थाएं व मूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा होने के साथ ही अपराध कम होते जाएगे।

आज सर्वाधिक आवश्यकता इस बात की है कि अपराधियों को दण्ड दिये जाने और अपराधों की धारणा पर जितना ध्यान दिया जाय ,मानवीय चेतना के प्रसार उससे भी अधिक हो।जब हम वैज्ञानिक प्रगति व विकास के चरम शिखर पर पहुँचने की बात करते हैं परन्तु साथ ही मुख्य आवश्यकता अपराधों व दुष्परवृत्तियो की प्रेरणा के आधारों को ही समाप्त करने की है। दुष्कर्म व यौन हिंसा को रोकने के साथ ही समाज व सरकार को दुष्परवृत्ति उन्मूलन के उपाय पर चिन्तन करना चाहिए ।

B. R. SAHU CO-EDITOR
B. R. SAHU CO-EDITOR
B.R. SAHU CO EDITOR - "CHHATTISGARH 24 NEWS"

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