डॉ. बिजेन्द सिन्हा जी का संपादकीय लेख “राजनीति का स्तर ऊँचा होना चाहिए”

रानीतराई :- भारतीय राजनीति में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। ना केवल चुनावी स्तर पर बल्कि दलीय स्तर भी। हाल ही में विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुए। जिसमें राजनीति के स्तर में गिरावट देखी गयी। सत्ता के लिए राजनैतिक मूल्यों की जितनी गिरावट अभी देखी गयी सम्भवतः इससे पहले कभी नहीं देखी गयी। राजनैतिक तत्वों के बीच कडवाहट व कटुता भी देखी गयी। विभिन्न हथकण्डे भावनात्मक मुद्दे ,क्षेत्रवाद, जातिवाद आदि का जमकर इस्तेमाल किया गया ।नगद राशि आभूषण शराब आदि बरामद किए गए। चुनाव में धन-बल का खूब इस्तेमाल किया गया। स्पष्ट है कि समाज में गरीबी व्याप्त है। अतः गरीबी उन्मूलन के लिए विशेष प्रयास किए जाएं ।जातिवाद व साम्प्रदायिकता की बेडियो में जकडी राजनीति अपने ही संकीर्ण लाभ तक सीमित है ।राजनैतिक शक्ति के कारण राजनीतिज्ञो ने लोकतंत्र की काफी उपेक्षा की है जिसके खेल में असहाय निर्दोष, धर्म भीरू जनता ही मोहरा बनती है। विभिन्न हथकण्डो के बीच असल मतदाता यानि जनता से जुड़े मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं। राजनैतिक दलों के घोषणा पत्रों से बुनियादी मुद्दे दूर हो रहे हैं। चुनावी विचार विमर्श में देश, देश का भविष्य व नीति के सवाल गायब रहे है। कोई कार्य योजना नहीं है। शराबबन्दी या नशामुक्ति पर राजनीति काफी होती रही पर शराबबन्दी या नशामुक्ति चुनाव का कोई मुद्दा ही नहीं है।

नेता गण राजनीति में धर्म और जाति के प्रभाव को खत्म नहीं करना चाहते हैं। जनता को धर्म व जाति के नाम पर भडकाकर वोट हासिल किए जाते हैं। ऐसे में योग्यता और अवसर का तालमेल बिठाने की कोशिश असफल हो जाती है। जातिवाद क्षेत्रवाद के चक्र में क ई दल फंसे हुए हैं। अगर हमें अपनी राजनीति को सुधारना है तो किसी के सान्सद विधायक बनने की बारियो को सीमित करना होगा। किसी भी दल व नेता को प्रतिभा साबित करने के लिए दस वर्ष काफी होते हैं इसलिए चुनाव आयोग को चाहिए कि किसी के भी दो बार ही जन प्रति निधि बनने की बारियो को सीमित कर देना चाहिए। कोई दो बार ही बन सके ऐसा नियम बनाना चाहिए। लोकतंत्र की सफलता का आधार चुनाव है।चुनाव का आधार जनता का वोट है। जनादेश भी राष्ट्रीय धरोहर है।लेकिन वर्तमान में बरामद किए गए आभूषण नगद राशि व शराब से स्पष्ट है कि चुनाव निष्पक्ष होने से दूर है। लोकतंत्र का आधार जनता का न होकर सत्ता के लिए राजनैतिक गठजोड़ तक सीमटता जा रहा है। सत्ता प्राप्ति के लिए राजनैतिक जीत हासिल करने जनादेश को धता बता कर सत्ता
प्राप्ति करना राजनीति का खेल बन गयी है। यहलोकतंत्र का मजाक और मतदाता का घोर अपमान है। साथ ही जनता की विचारधारा का उपहास है। स्पष्ट है कि लोकतंत्र शुद्ध व्यापार बनते जा रहा है। कर्नाटक गोवा महाराष्ट्र का उदाहरण सामने है। वर्तमान चुनाव में जनता से बोली लगने जैसा माहौल रहा। राजनीति में अपराध राजनैतिक शुचिता के लिए गम्भीर समस्या है। राजनीति में अपराधीकरण के कारण राजनीति से भरोसा उठते जा रहा है। राजनैतिक दलों द्वारा अपूरणीय चुनावी घोषणाओ की सीमाबन्दी के लिए चुनाव आयोग को कदम उठाने चाहिए। घोषणाओ की सीमाबन्दी के लिए संवैधानिक स्तर पर भी प्रयास किये जाने चाहिए। चुनाव में धन-बल व बाहुबल का सहारा लेने वालो को राजनैतिक दलों को टिकट नहीं देने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए
“कर्जमाफी के लिए स्थायी समाधान की जरुरत”
देश व राज्य में किसानों का कर्जदार होना चिन्ता का विषय है। सरकार कर्जमाफी व मुआवजे जैसी अस्थायी समाधान नहीं बल्कि कृषि की मूलभूत समस्याओं पर ध्यान दे। बैंक ऋणों से बचाकर स्वावलंबी बनाना व फसल बीमा योजनाओं को ईमानदारी से लागू करवाना चाहिए। राजनैतिक दलों द्वारा किये गये वादों में नीतियो व योजनाओं की बजाय मुफ्तखोरी की घोषणाएं प्रमुखता से होने लगी है। लुभाने वाली घोषणा ओ से निजात पाने का फिलहाल कोई उपाय नजर नहीं आ रहा है। राजनैतिक दल जनता को मुफ्त सुविधा की राह दिखाने का कोई कसर नहीं छोड रहा है। जनता के लिए मुफ्तखोरी की घोषणाएं अब आम बात होने लगी है। देश व राज्य की आर्थिक समस्याओं से प्रभावी ढंग से निपटना कर्जमाफी व मुफ्त सुविधा से सम्भव नहीं है। मुफ्त की योजनाओं का सरकारी, सामाजिक व अन्य क्षेत्रों के खर्च पर क्या प्रभाव होगा यह विचारणीय हो गया है। जहाँ जहाँ मुफ्तखोरी की स्कीम ज्यादा है वहीं वहीं राज्यों पर कर्ज भी बढता जा रहा है। दुनिया के क ई देश मुफ्तखोरी के कारण सरकारी कर्ज बढने व क ई देशो के मुफ्तखोरी के कारण बर्बाद होने के भी उदाहरण हैं। श्री लंका का उदाहरण सामने है। मुफ्तखोरी की असंगत आर्थिक नीतियों के चलते हालत बदतर हो सकती है। इससे छुटकारे की जरूरत है। मूल्यों व मुद्दों आधारित राजनीति होनी चाहिए।

B. R. SAHU CO-EDITOR
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B.R. SAHU CO EDITOR - "CHHATTISGARH 24 NEWS"

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