हमारा छत्तीसगढ़ राज्य कला और संस्कृति के धनी है और यहाँ हर एक मौसम के लिए हर एक त्योहार खास पहचान बनाई है यहाँ अलग-अलग पारंपरिक गीत और नृत्य के साथ हर कला की अलग खासियत और अलग पहचान है
छत्तीसगढ़ी भाषा मे ‘तोता’ को कहा जाता है ‘सुआ’
संतोष देवांगन-संपादक
छत्तीसगढ़- हमारा छत्तीसगढ़ राज्य कला और संस्कृति के धनी है यहाँ हर एक मौसम के लिए हर एक त्योहार और अलग-अलग पारंपरिक गीत और नृत्य हैं हर एक गीत और हर एक नृत्य की अलग खासियत है पहचान है ,हम छत्तीसगढ़ियों की इनसे जुड़ी अलग खुशी है और अलग उमंग है. हमारा छत्तीसगढ़ आदिवासी बाहुल्य और ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्र होने की वजह से यहां की संस्कृति बेहद ही खूबसूरत और निराली है. इन्हीं संस्कृति और कला के बीच छत्तीसगढ़ प्रदेश में लोकप्रिय है ‘सुआ गीत’ और ‘सुआ नृत्य’ जिसे दशहरे के बाद या शरद पूर्णिमा के बाद से ही छत्तीसगढ़ में माताओं और बहनों के द्वारा सुआ गीत गाना शुरु कर दिया जाता है. वहीं ग्रामीण अंचलों में इसकी शुरुआत जल्दी ही हो जाती है ।
‘सुआ गीत’ अपनी मन के भाव को बताने वाला है
बताया जाता है कि सुआ गीत और नाच में मुख्य रुप से महिलाएं अपनी मन के भाव को व्यक्त करता है. क्योंकि ऐसा माना जाता है कि, तोता महिलाओं को प्रिय होता है और वह इंसानों की तरह बोल भी पाता है. ये जरूर है कि सुआ गीत में करुण रस जरुर होता है, फिर भी इसमें छत्तीसगढ़ी जीवन शैली के कई रंग हमे देखने को मिलते हैं।
छत्तीसगढ़ मे सैकड़ो साल से मौजूद है यह ‘सुआ नृत्य’
वैसे तो सुआ नृत्य गोंडी/गोंडी लोगों का पारंपरिक नृत्य है, लेकिन यह पूरे प्रदेश में प्रचलित है. छत्तीसगढ़ के जानकर कहते हैं कि सुआ नृत्य आदिवासी समाज में सैकड़ों साल से मौजूद है. छत्तीसगढ़ की इस खास पहचान को सहजकर रखने की जरुरत है. सरकार को इस परंपरा को जिंदा रखने पहल करनी चाहिए.
‘सुआ नाच’ इस तरह से किया जाता है
दिवाली के कुछ दिनों पहले महिलाएं लकड़ी से या मिट्टी से बने सुआ की प्रतिमा को बांस की टोकनी(टुकना) में रखकर और उसके पास दीया रखकर माताओं-बहनों मे से किसी एक द्वारा उस टोकनी को अपने सिर पर उठा के टोली शहर और गांव के घरों में जाकर उस टोकनी को सिर से उतारकर जमीन मे रख के टोली की सारी महिलाएं उस टोकरी को घेरकर एक गोला बना लेती है और उस टोकरी के चारों ओर घूमकर सुआ गीत गाते हुए नाचती हैं. इस सुआ गीत और नृत्य करने के बाद बदले में उन्हें उन घर वालों के द्वारा कच्चे अनाज दिए जाते हैं साथ ही श्वेक्छा अनुसार पैसे भी दिए जाते हैं और इसके साथ ही बदले मे ‘सुआ गीत’ गाने वाली महिलाएं उन दान कर्ताओं को आशीष/आशीर्वाद देकर वहां से हटकर फिर दूसरे घरों की ओर जाती हैं.
बच्चियां भी अलग टोली बनाकर घरों में सुआ नृत्य करने निकल पड़ती हैं
बतादे की महिलाओं के साथ-साथ बच्चियां भी अपनी अलग से टोली बनाकर सुंदर छत्तीसगढ़ी पोशाक पहनकर घरों में सुआ नृत्य करने निकल पड़ती हैं इस सुआ मे महिलाओं के साथ-साथ बच्चियां भी अपनी अलग टोली बनाकर सुंदर छत्तीसगढ़ी पोशाक पहनकर घरों में सुआ नृत्य करने जाती हैं।




