मनेन्द्रगढ़ वन मंडल में भारी बवाल: प्रदेश अध्यक्ष अजीत दुबे के ‘अपमान’ पर भड़के वन कर्मचारी, DFO के खिलाफ जमकर नारेबाजी शासकीय रेस्ट हाउस में कमरा देने से इनकार पर भड़का आक्रोश, घंटों चला हाई-वोल्टेज ड्रामा; बंद कमरे में तीखी वार्ता के बाद झुके अधिकारी

मनेन्द्रगढ़ वन मंडल में भारी बवाल: प्रदेश अध्यक्ष अजीत दुबे के ‘अपमान’ पर भड़के वन कर्मचारी, DFO के खिलाफ जमकर नारेबाजी

शासकीय रेस्ट हाउस में कमरा देने से इनकार पर भड़का आक्रोश, घंटों चला हाई-वोल्टेज ड्रामा; बंद कमरे में तीखी वार्ता के बाद झुके अधिकारी

मनेन्द्रगढ़ (MCB) | 

मनेन्द्रगढ़ वन मंडल कार्यालय में मंगलवार को उस समय प्रशासनिक मर्यादाएं और विभागीय तालमेल तार-तार हो गए, जब वन विभाग के मुखिया और अधीनस्थ कर्मचारियों के बीच सीधे टकराव की स्थिति पैदा हो गई। छत्तीसगढ़ वन कर्मचारी संघ के प्रांतीय अध्यक्ष अजीत दुबे के प्रथम मनेन्द्रगढ़ आगमन पर वन मंडलाधिकारी (DFO) चंद्र कुमार अग्रवाल द्वारा शासकीय विश्राम गृह (रेस्ट हाउस) का कमरा देने से दो टूक इनकार करने के बाद पूरा वन मंडल परिसर कुरुक्षेत्र में तब्दील हो गया। विभाग के सर्वोच्च कर्मचारी नेता के साथ हुए इस व्यवहार ने सुलगती आग में घी का काम किया, जिसके बाद जिले भर के वन कर्मचारी लामबंद हो गए।

DFO कार्यालय का घेराव, परिसर में गूंजे ‘तानाशाही नहीं चलेगी’ के नारे

​जैसे ही यह खबर बाहर फैली कि प्रांतीय अध्यक्ष को ठहरने की अनुमति नहीं दी गई है, कर्मचारियों का गुस्सा फूट पड़ा। देखते ही देखते जिले भर से आए सैकड़ों वन कर्मचारियों ने डीएफओ कार्यालय को चारों तरफ से घेर लिया। आक्रोशित कर्मचारियों ने वन मंडलाधिकारी के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए “कर्मचारी एकता जिंदाबाद” और “डीएफओ की तानाशाही नहीं चलेगी” जैसे गगनभेदी नारे लगाए। प्रदर्शनकारी कर्मचारियों का साफ तौर पर आरोप था कि यह सिर्फ एक कमरे का इनकार नहीं है, बल्कि यह पूरे प्रदेश के वन अमले की अस्मिता और सम्मान पर सीधी चोट है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

बंद कमरे में हाई-वोल्टेज ड्रामा; चैंबर बना ‘कुरुक्षेत्र’

​बाहर बढ़ते जनाक्रोश, उग्र होती नारेबाजी और तनावपूर्ण स्थिति को भांपते हुए प्रांतीय अध्यक्ष अजीत दुबे स्वयं जिले के पदाधिकारियों के साथ डीएफओ चंद्र कुमार अग्रवाल के चैंबर में दाखिल हुए। बंद कमरे के भीतर दोनों पक्षों के बीच बेहद तीखी, गंभीर और मैराथन वार्ता हुई। सूत्रों के मुताबिक, वार्ता के दौरान दोनों ओर से भारी आक्रोश देखने को मिला और बातचीत कई बार बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई। कर्मचारी नेता इस बात पर अड़े थे कि शासकीय नियमों के तहत विभागीय संगठन के मुखिया को विश्राम गृह की पात्रता है, फिर भी जानबूझकर यह गतिरोध पैदा किया गया।

प्रशासनिक भूल या आपसी तालमेल का अभाव?

​पहली बार जिले के दौरे पर आए वन कर्मचारी संघ के इतने बड़े पदाधिकारी के स्वागत और सत्कार की जगह इस तरह का तीखा विवाद खड़ा होना वन विभाग के आंतरिक समन्वय और प्रशासनिक दूरदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इस घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया कि जिले में उच्च अधिकारियों और कर्मचारी संगठनों के बीच संवाद की भारी कमी है, जिसके कारण आए दिन ऐसे विवाद जन्म ले रहे हैं।

घंटों चले गतिरोध का हुआ पटाक्षेप, अंततः एलाट हुआ कमरा

​विवाद और बढ़ते दबाव के बाद आखिरकार मामले को शांत कराया जा सका। मैराथन बैठक के बाद चैंबर से बाहर निकलकर प्रांतीय अध्यक्ष अजीत दुबे ने मीडिया को वस्तुस्थिति से अवगत कराया।

डीएफओ ने मानी अपनी भूल

“डीएफओ चंद्र कुमार अग्रवाल ने बैठक में स्वीकार किया कि उन्हें पूर्व में इस बात की पूरी जानकारी नहीं थी। उन्होंने भविष्य में कर्मचारी संघों के साथ बेहतर तालमेल बनाकर और सामंजस्य के साथ कार्य करने का भरोसा दिया है। विवाद के बाद अब वन विभाग के रेस्ट हाउस में कमरा आवंटित कर दिया गया है।”

अजीत दुबे, प्रांतीय अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ वन कर्मचारी संघ

 

​कमरा आवंटन और डीएफओ के नरम रुख के बाद ही कर्मचारियों का गुस्सा शांत हुआ और वन मंडल परिसर में घंटों से चल रहा बवंडर थमा। हालांकि, इस घटना ने प्रशासनिक हलकों में एक नई बहस जरूर छेड़ दी है।

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