* ईश्वर गौरा गौरी की भव्य विवाह…
* गौरी गौरा विवाह मे बराती बनना भगवान शिव की कृपा है – छन्नूलाल साहू…
* बारातियों मे दिखी सुंदर आदिवासी सांस्कृतिक परिधान एवं नृत्य…
(छन्नूलाल साहू -पाटन) : इन दिनों सम्पूर्ण भारत मे पांच दिवसीय दिपावली महोत्सव का रस्मोरिवाज एवं आनंद चरम पर है। भारतीय समाज विविध संस्कृति सभ्यताओं का संवाहक है। यहां वर्ष भर उत्सव,पर्व, त्यौहार विविध धर्मावलंबियों द्वारा मनाया जाता है।
मूलतः हिन्दू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की छाप एवं आर्य संस्कृति सभ्यता के पूजक हिन्दू धर्मावलंबी प्रति वर्ष कार्तिक मास मे, असुरों पर विजय प्राप्त कर भगवान राम की चौदह साल बाद अयोध्या वापस आने की खुशी मे दिपावली का त्यौहार मनाया जाता है।
इस दिन पौराणिक कथा अनुसार भगवान शिव और पार्वती का गौरा गौरी स्वरूप मे विवाह हुआ था। हमारे आदिवासियों लोक संस्कृति मे शिव जी को विशेष आराध्य देव माना जाता है। इसीलिए आदिवासी समुदाय द्वारा गौरा गौरी बिहाव बहुत ही हर्षोल्लास से कराने की आदि परंपरा रही है।
छत्तीसगढ़ प्रदेश मुख्यतः आदिवासी बहुल संस्कृति को सहेजने के लिए जाने जाते हैं। जहां जहां आदिवासी बहुल गांव हैं वहां गौरा गौरी बिहाव का अद्भुत आनंदमय दृश्य उभरता है।
पाटन गोंडवाना राज समाज एक समृद्ध विरासत के धरोहर रहें हैं। इस अंचल के ग्राम गब्दी लगभग सत्तर फीसदी आदिवासी बहुल गांव हैं। यहां दिपावली पर्व पर गौरी गौरा विवाह भव्यता का अद्भुत मिसाल है।
संपूर्ण आदिवासी संस्कृति, नृत्य, परिधान,रस्म रिवाज, दिपावली पर्व को बेहद हर्षोल्लास,रोमांच से सराबोर कर देता है। शिव जी के विवाह में सभी समाज के लोग बराती बनकर ईश्शर देव के आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं।
ऐसा लगता है पुरा गांव “सत्यम शिवम् सुंदरम” को अवगाहन कर शिवमय हो जाता है। गौरा गौरी बिहाव ही इस गांव का राजा हिमाचल के राज जैसी अनुभूति करा देता है। गांव के बाहर नौकरीपेशा मे गए लोग भी त्योहार मे आते हैं तो गौरा गौरी बिहाव मे घराती बराती बनकर आपस मे भेंट मुलाकात करते हैं।
गांव के शिक्षाविद छन्नूलाल साहू बताते हैं कि गौरी गौरा विवाह मे बराती बनना भगवान शिव की कृपा है। बिहाव का दृश्य इतना आनंदित करने वाली होती है कि एक क्षण के लिए ओझल नहीं कर पाते।
प्रारंभ से विसर्जन तक गौरा राजा के साथ रहते हैं। गुरुजी बताते हैं कि उस गांव मे भगवान शंकर के कई सिद्ध भक्त हैं। जिनके ऊपर शिव जी विशेष कृपा है उनके लक्षण भी दिखाई पड़ते हैं। शिव और आदिवासी संस्कृति पर अब भी शोध अन्वेषण की आवश्यकता है।




