
राजनांदगांव जिला अस्पताल में हाल ही में एक प्रसूता महिला की इलाज के दौरान डॉक्टरों और नर्सों की लापरवाही के चलते मौत हो गई। यह कोई पहली घटना नहीं है। इससे पूर्व भी जिला अस्पताल के गायनिक वार्ड में पदस्थ डॉ. कोठारी की कथित तानाशाही और अव्यवहारिक रवैये के कारण कई प्रसूताओं और उनके परिजनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा है। समय पर उपचार न मिलना यहां आम बात बन चुकी है।
पूरे अस्पताल में अव्यवस्था का माहौल है, जो प्रशासनिक कसावट की कमी को साफ दर्शाता है। किसी भी जिले में कलेक्टर की प्राथमिक जिम्मेदारी स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त रखना होती है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिले में पदस्थ हुए कलेक्टर को लगभग छह माह बीत चुके हैं और इस दौरान उन्होंने केवल एक बार जिला अस्पताल का दौरा किया, वह भी महज औपचारिकता निभाने के लिए।
यदि कलेक्टर नियमित रूप से अस्पताल का निरीक्षण करते, तो स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार संभव था। दौरे नहीं होने का ही नतीजा है कि अस्पताल प्रशासन मनमानी पर उतारू है और डॉक्टर खुद को जवाबदेही से ऊपर समझने लगे हैं। न कोई निगरानी है, न ही कोई रोक-टोक।
प्रसूता महिला की मौत को केवल एक चिकित्सकीय चूक कहना सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा। यह घटना सीधे-सीधे प्रशासनिक लापरवाही और संवेदनहीन व्यवस्था का परिणाम है।




