नियम तोड़ा तो ₹20,000 जुर्माना — खुद ग्रामीण पहुँचाएंगे थाना!
शशिकांत सनसनी छुईखदान छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ के खपरी गांव ने अवैध शराब के खिलाफ एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए स्वतंत्र रूप से पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी है। इस निर्णय के साथ ग्रामीणों ने न केवल शराब माफिया और पुलिस की कथित मिलीभगत को चुनौती दी है, बल्कि यह संदेश भी दिया है कि जब व्यवस्था असफल हो जाए, तब क्रांति की शुरुआत चौपाल से करनी पड़ती है।
तीन बैठकों में बनी आम सहमति, अब गांव में शराब पूरी तरह प्रतिबंधित
गत दो दिनों में तीन बार ग्राम सभा की बैठक आयोजित की गई, जिसमें ग्रामवासियों ने सर्वसम्मति से यह ऐलान किया कि अब खपरी गांव में न शराब बनेगी, न बिकेगी, न पी जाएगी।
इस निर्णय को लागू करने के लिए 14 सदस्यीय निगरानी समिति गठित की गई है, जो शराबबंदी के नियमों का सख्ती से पालन कराएगी।
शराबबंदी के नियम इस प्रकार हैं:
कच्ची महुआ शराब का निर्माण, बिक्री और सेवन पूरी तरह प्रतिबंधित।
नियम तोड़ने पर ₹20,000 का जुर्माना।
शराब बिक्री की सूचना देने वाले को ₹5,000 तक का इनाम।
चेतावनी के बाद भी न मानने पर सामाजिक बहिष्कार।
यदि कोई व्यक्ति शराब बनाते या बेचते पकड़ा गया, तो ग्रामीण स्वयं उसे पकड़कर थाना तक ले जाएंगे।
गठित निगरानी समिति के सदस्य:
लक्ष्मण निषाद, दीनदयाल जंघेल, पन्नालाल साहू, नेहरू साहू, कामता बघेल, लक्की नेताम, तोरण साहू (सरपंच), वीरेंद्र साहू (पूर्व सरपंच प्रतिनिधि), राजेश निषाद, राहुल साहू, पन्नू यादव, ध्रुव जंघेल यादव, राम जंघेल, अमीर जंघेल।
शराबबंदी कोई घोषणा नहीं, गांव की आत्मा का संकल्प है”
समिति सदस्यों — राजेश निषाद, पन्नू यादव, लक्की नेताम, दीनदयाल जंघेल — ने स्पष्ट किया कि यह कदम सिर्फ प्रशासनिक असफलता के विरुद्ध विरोध नहीं, बल्कि गांव की आत्मा की पुकार है।
अब न तो पुलिस पर भरोसा है, न सिस्टम पर। हम खुद अपनी व्यवस्था बनाएंगे। कोई भी हो, नियम तोड़ने पर बख्शा नहीं जाएगा।”
प्रशासन पर गंभीर आरोप, ‘सेटिंग सिस्टम’ उजागर
ग्रामसभा में ग्रामीणों ने थाना प्रशासन पर भी गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि कई शराब माफिया ₹25,000 से ₹50,000 तक देकर थाना में ‘सेटिंग’ कर लेते हैं। कुछ शराब कारोबारी खुलेआम कहते सुने गए कि “हमारा थाना में सेटिंग है, जब भी पकड़े जाएंगे पैसा देकर छूट जाएंगे।”
गांव ने लिया संकल्प, अब बदलाव गांव से शुरू होगा
ग्रामीणों का कहना है कि अब भरोसा किसी तंत्र पर नहीं, बल्कि अपनी जागरूकता, एकजुटता और सामाजिक शक्ति पर है। यह निर्णय महज़ एक आंदोलन नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत है।




