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विस्मरण : 1975 की पटना बाढ़: एक ऐतिहासिक आपदा की गाथा

रिपोर्ट अनमोल कुमार


अगस्त 1975 में पटना में आई बाढ़ ने न केवल शहर की भौतिक संरचना को प्रभावित किया, बल्कि लोगों की मानसिकता और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव डाला। यह बाढ़ गंगा और सोन नदियों के जलस्तर में अप्रत्याशित वृद्धि के कारण आई, जिससे शहर के अधिकांश हिस्से जलमग्न हो गए।

प्रशासनिक निर्णय और दानापुर छावनी की रक्षा

जब पानी दानापुर छावनी में प्रवेश करने लगा, तो सेना ने त्वरित निर्णय लेते हुए दानापुर के स्वचालित पुल को बुलडोज़र से तोड़ दिया। इस कदम से छावनी तो बच गई, लेकिन सारा दबाव पटना शहर की ओर आ गया, और राजधानी के अधिकांश हिस्से डूब गए। यह निर्णय आज भी इतिहास में बहस का विषय है कि छावनी बचाने की कीमत पर पटना को क्यों तबाह होने दिया गया।

बाढ़ का प्रभाव और राहत कार्य

शहर के विभिन्न इलाकों जैसे रूपसपुर, राजेंद्र नगर, राजवंशी नगर, शास्त्री नगर, बोरिंग रोड, श्री कृष्ण नगर, मंदीरी और पाटलिपुत्र कॉलोनी तक 6 से 10 फीट पानी में डूब गए थे। सरकारी और अर्ध-सरकारी सभी कार्यालयों में पानी घुस गया था। आकाशवाणी, टेलीफोन एक्सचेंज, पोस्ट ऑफिस, बिजली भवन और राजस्व कार्यालय तक जलमग्न हो गए थे।

राहत कार्यों के तहत, हेलीकॉप्टरों के माध्यम से आवश्यक सामग्री जैसे खाद्यान्न और दवाइयाँ प्रभावित क्षेत्रों में पहुँचाई गईं। यह राहत कार्य इमरजेंसी के दौरान किए गए थे, जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देशभर में आपातकाल की घोषणा की थी।

मीडिया पर प्रभाव

बाढ़ के कारण स्थानीय दैनिक सर्चलाइट सहित सभी अख़बार 26 अगस्त से 30 अगस्त तक बंद रहे। यह संभवतः भारतीय पत्रकारिता के इतिहास की अद्वितीय घटना थी, जब राजधानी का प्रमुख समाचार-माध्यम छ: दिनों तक ठप हो गया।31 अगस्त 1975को पुनः अखबार छपा ।आकाशवाणी भी बंद था। पानी धीरे –धीरे घटने लगा।

आध्यात्मिम दृष्टिकोण : महात्मा बुद्ध अपने निवेदन से पूर्व भविष्यवाणी की थी कि ” पटना को सदा पानी और आग का खतरा बना रहेगा। इतिहास ने यह कठिन साबित किया··– 1975 की बाढ़ इसकी साक्षात् मिसाल है।

निष्कर्ष : 1975 का पटना बाढ़ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं था, बल्कि यह मानवीय साहस,प्रशासनिक निर्णय और लोक स्मृति की त्रासदी की गाथा है। उस दिन यानी 25 अगस्त 1975 को भी दिन सोमवार था और आज 50 वर्ष बाद 25 अगस्त 2025 को भी सोमवार है। तब मै द्वारका हाई स्कूल मंदिरी पटना में वर्ग 8 का विद्यार्थी था। विद्यालय भी गया था, लेकिन दो घंटी पढ़ाने के बाद सरकारी सूचना प्राप्त होने पर विद्यालय बंद कर दिया गया और मात्र दो घंटे के अंदर ही घर छोड़ना पड़ा। मुहल्ले एक तल्ला डूब चुका था। जान माल की बहुत क्षति हुआ था। पटना जिलाधिकारी के आवास के सामने दानापुर··–गांधी मैदान मुख्य पथ पर शरण लिए थे। पानी डॉ अनुग्रह नारायण सिंह आर्थिक परिवर्तन एवं सामाजिक संस्थान के टंकी से पानी मिलता था। जीवन काफी कष्टमय था। सरकारी हेलीकॉप्टर से कुछ मिलने के उम्मीद पर ही जीवन गुजर बसर होता था। कहीं आना जाना बिल्कुल ही बंद था।

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