रिपोर्टर- शशिकांत सनसनी गरियाबंद । छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले से एक ऐसी मार्मिक तस्वीर सामने आई है, जो विकास के तमाम दावों पर सवाल उठाती है। जरनडीह गांव के आदिवासी बच्चे हर दिन मिडिल और हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए जान जोखिम में डालकर धवलपुर तक का 4 किलोमीटर लंबा पैदल सफर तय करते हैं। रास्ते में पड़ने वाला बाकड़ी पैरी नाला, बारिश में उफान पर होता है। बच्चे घुटनों से लेकर कमर तक के पानी में से गुजरते हैं… और फिर जंगलों के बीच 2 किलोमीटर और पैदल चलकर स्कूल पहुंचते हैं।
12 साल पहले इसी नाले को पार करते वक्त 9वीं कक्षा की छात्रा जमुना की डूबने से मौत हो गई थी। इस हादसे के बाद उसके भाई हेमसिंह ने तय कर लिया कि अब कोई और बच्चा इस नाले का शिकार नहीं बनेगा। तब से लेकर आज तक, हर बरसात में वह बच्चों को अपने कंधे पर बिठाकर या हाथ पकड़कर सुरक्षित पार कराता है।
देविका, स्कूली छात्रा – यूनिफार्म में, हेमसिंह नेताम – टोपी लगाए हुए, जमुना का भाई , स्थानीय जनप्रतिनिधियों की मांग पर बाकड़ी पैरी नाला पर 6 करोड़ की लागत से पुल निर्माण का प्रावधान तो बजट में हो गया, लेकिन डीपीआर की फाइलें अब तक धूल फांक रही हैं।
दिनेश नेताम, सरपंच – टकला युवक, संजय नेताम, सदस्य जिला पंचायत – दाढ़ी वाला अब लोक निर्माण विभाग का कहना है कि बरसात के बाद पुल निर्माण की प्रक्रिया को गति दी जाएगी। जरनडीह के इन बच्चों के सपनों की राहें आज पानी में डूबी हैं… सवाल यह है कि क्या अफसरों की फाइलों से निकलकर कभी वो पक्की राह बन पाएगी?
