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भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा सरकारी अस्पताल, जर्जर बिल्डिंग में स्टाफ की जान जोखिम में

धमतरी । छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में सरकारी स्वास्थ्य सेवा किस कदर बदहाल है, इसकी एक शर्मनाक तस्वीर सामने आई है। उप स्वास्थ्य केंद्र सियारीनाला की हालत ऐसी है कि यहाँ काम कर रहा मेडिकल स्टाफ खुद को रोज़ मौत के साए में पाता है। बिल्डिंग जर्जर है, छत का प्लास्टर गिर रहा है, और बारिश के दिनों में कमरे तालाब बन जाते हैं। सवाल ये है कि क्या जनता की जिंदगी इतनी सस्ती है कि भ्रष्टाचार के आगे उसका कोई मोल ही नहीं?

 

धमतरी जिले के डुबान क्षेत्र में बसे सियारीनाला गांव का उप स्वास्थ्य केंद्र भ्रष्टाचार की ज्वलंत मिसाल बन गया है। 2008 में बने इस भवन की हालत अब इतनी खस्ता हो चुकी है कि मरीजों का इलाज तो दूर, अब स्टाफ खुद जान हथेली पर रखकर काम करने को मजबूर है।

बिल्डिंग की छत का ऊपरी हिस्सा तो ढलाई से मजबूत बना दिखता है, लेकिन अंदर की दीवारों और छत के नीचे प्लास्टर तक नहीं किया गया। नतीजा – बारिश में पानी टपकता है, कमरे लबालब भर जाते हैं, और दवाइयाँ भीगकर बेकार हो जाती हैं।

गांव के लोगों के मुताबिक, 2008 में तत्कालीन प्रभारी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की अनुशंसा पर ये भवन बना था। लेकिन निर्माण के वक्त ठेकेदार और अधिकारियों की मिलीभगत से घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया। साल-दर-साल भवन की हालत और बिगड़ती गई, और अब यह पूरी तरह से जर्जर हो चुका है।

ईश्वर सिंह मंडावी, जागरूक नागरिक (सियारीनाला):
“बिल्डिंग पूरी तरह से जर्जर हो चुकी है, प्लास्टर गिर रहा है… कई बार नए भवन की मांग की, लेकिन सुनवाई नहीं हुई।”

दुलारी ठाकुर, एनएम (उप स्वास्थ्य केंद्र):
“यहाँ 5–6 गांव के मरीज आते हैं, लेकिन डिलीवरी नहीं हो पाती। कमरे जर्जर हैं, छत से प्लास्टर गिरता है, मरीजों को रिफर करना पड़ता है।”

मीरा बाई यादव, स्थानीय महिला:
“प्लास्टर गिरते रहता है, बहुत डर लगता है… किसी दिन बड़ा हादसा हो सकता है।”

स्थानीय प्रशासन ने आखिरकार इस गंभीर स्थिति का संज्ञान लिया है। जिला कलेक्टर अविनाश मिश्रा ने बताया कि उन्होंने अधिकारियों की बैठक लेकर PWD विभाग को निर्देशित किया है कि जिले में जिन स्वास्थ्य केंद्रों की इमारतें जर्जर हैं, उनकी सूची बनाकर शासन को प्रस्ताव भेजा जाए, ताकि नए भवनों की स्वीकृति मिल सके।

अविनाश मिश्रा, कलेक्टर (धमतरी):
“हमने PWD को निर्देश दिए हैं कि प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा जाए, ताकि जल्द स्वीकृति मिले और नए भवन बन सकें।”

तो सवाल ये है कि आखिर कब तक आम जनता को भ्रष्टाचार की कीमत अपनी जान जोखिम में डालकर चुकानी पड़ेगी? जो भवन सालों तक टिकने चाहिए, वो चंद वर्षों में ही ढहने की कगार पर क्यों पहुंच जाते हैं? ज़रूरत है ऐसे ठेकेदारों और जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्यवाही की, ताकि जनता को उसका हक और सुरक्षित सुविधाएं मिल सकें।

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