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शराब घोटाला मामला: जमानत पर रिहा हुए कवासी लखमा, लेकिन जेल के बाहर गायब रहा कांग्रेस का बड़े नेता

शशिकांत सनसनी छत्तीसगढ़

रायपुर – छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब घोटाले से जुड़े मामले में लंबे समय बाद जमानत पर रिहा हुए वरिष्ठ आदिवासी नेता और पूर्व मंत्री कवासी लखमा का स्वागत उनके समर्थकों ने पूरे उत्साह के साथ किया। जेल के बाहर उनकी पत्नी और बेटा मौजूद रहे। लेकिन जैसे ही देर शाम रायपुर सेंट्रल जेल के गेट खुले, कांग्रेस की कथित एकजुटता भी सवालों के घेरे में आ गई।

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि न प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज, न पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, न नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत, और न ही पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. बाबा—कोई भी बड़े कांग्रेसी नेता कवासी लखमा को रिसीव करने नहीं पहुंचा। यह चुप्पी क्या महज संयोग है, या फिर आदिवासी नेतृत्व के प्रति कांग्रेस की दोहरी नीति…

जब चैतन्य बघेल रिहा हुए थे, तब क्यों उमड़ी थी भीड़

राजनीतिक गलियारों में सवाल गूंज रहा है। जब पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल जेल से रिहा हुए थे, तब कांग्रेस ने पूरी ताकत झोंक दी थी। नेताओं की कतार, कैमरों की चमक और बयानों की बाढ़—सब कुछ मौजूद था। तो फिर भोले-भाले आदिवासी नेता कवासी लखमा के साथ यह बेरुखी क्यों?

क्या आदिवासी होना अपराध बन गया

कवासी लखमा न सिर्फ वरिष्ठ नेता हैं, बल्कि वे उस आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसके नाम पर कांग्रेस दशकों से राजनीति करती आई है। मंचों से आदिवासी अधिकारों की बात करने वाली पार्टी, जेल के बाहर अपने ही आदिवासी नेता के साथ खड़ी नहीं दिखी। यह घटना कांग्रेस की आदिवासी हमदर्दी के दावों पर सीधा हमला है। सवाल यह भी है कि क्या पार्टी के भीतर ‘परिवार पहले’ और ‘आदिवासी बाद में’ की नीति चल रही है…अगर ऐसा नहीं है, तो फिर शीर्ष नेतृत्व की गैरमौजूदगी का जवाब कौन देगा।

राजनीतिक संदेश साफ

कवासी लखमा की रिहाई के दिन कांग्रेस नेताओं की अनुपस्थिति ने एक साफ संदेश दे दिया।आदिवासी नेता मंच पर जरूरी हैं, लेकिन मुश्किल वक्त में शायद नहीं। अब देखना यह है कि कांग्रेस इस सवाल का जवाब देती है या फिर यह मामला भी आदिवासी उपेक्षा की लंबी फेहरिस्त में दर्ज होकर रह जाएगी।

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