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डॉ. बिजेन्द सिन्हा का संपादकीय लेख “मुफ्त सुविधा की राजनीति देशहित में नहीं”

संपादकीय लेख : स्वतंत्रता के पश्चात् राजनीति मूल्यों व मुद्दों आधारित थी। गम्भीर समस्याओं व बुनियादी मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति राजनीतिक दलों का मुख्य एजेण्डा होता था बाद में राजनीति सत्ता केन्द्रित होती चली गयी, राजनैतिक दल सत्ता प्राप्ति के लिए कई तरह के तरीके अपनाने लगे,भावनात्मक मुद्दे ,जात पात की राजनीति ,एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप व मुफ्त सुविधा प्रदान करना आदि जिसमें मुफ्त सुविधा की राजनीति जोर पकड़ने लगी है।

किसी भी राष्ट्र या राज्य के निर्माण के लिए दूरदर्शी सोच,मूल्यों और मुद्दों की जरुरत होती है परन्तु वर्तमान समय में समय मे राजनैतिक दल सत्ता प्राप्ति के लिए कई तरह के हथकण्डे अपनाते हैं, ऐसे तरीके अपनाकर भले ही वे राजनीतिक जीत हासिल कर ले या जितना भी समय तक शासन कर ले यह उनकी सच्ची सफलता नहीं कही जा सकती है। बुनियादी मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति कराना सरकार की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए समाज के लिए बेहतर व्यवस्था व सुशासन सरकार व राजनैतिक दलों का पहला दायित्व है, समाज में भूख ,कुपोषण,गरीबी व बेरोजगारी आज भी व्यापत है।

आज भी लोग विविध व विकट समस्याओं से लोग जूझ रहे हैं,हिंसा,असुरक्षा,बीमारी व अपराधीकरण आदि समस्याओं का समाधान पहली प्राथमिकता होनी चाहिए मुफ्त सुविधा प्रदान करने से मुद्दा आथारित विकास सम्भव नहीं है, मुफ्त सुविधा की राजनीति समग्र विकास व व्यक्ति की आर्थिक स्वावलम्बन के लिए बाधक है, बढ़ती महंगाई के मूल में मुफ्तखोरी की राजनीति भी है, हद तो यह है कि कर्ज लेकर मुफ्त सुविधा प्रदान की जाती है, यदि यही प्रवृति जारी रही तो बेरोजगारी,महंगाई,आर्थिक विषमता व कुपोषण जैसी समस्याएं भयानक रूप ले लेंगी।

मुफ्त सुविधा की राजनीति आर्थिक सुधार के लिए भी बाधक है,कर्ज लेकर मुफ्त सुविधा प्रदान करना “ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत” वाली कहावत को चरितार्थ करता है हम अपनी सुविधा व सीमित सोच पर यह भूल चुके हैं कि आने वाले दिन पर यह कितना भारी है। सवाल सिर्फ मुफ्त सुविधा से सत्ता प्राप्ति का ही नहीं है बल्कि यह जनता के विवेक पूर्ण परिष्कृत दृष्टिकोण व सम्मान जनक सोच के साथ खिलवाड़ है, यह जनता को भ्रम में डालने जैसा है, इस तरह के छोटे बड़े-बड़े प्रलोभनो से बच पाने का सामर्थ्य का होना भी जरूरी है।

हम छोटी मोटी सुविधाओं मे फंस जाते हैं और मुख्य मुद्दा कहीं पीछे छूट जाता है, हमें यह समझना होगा कि समग्र विकास के लिये मुख्य मुद्दों को क्रियान्वित करने की जरुरत है और यह तभी संभव है जब हम प्रलोभन से बचकर विवेकपूर्ण परिष्कृत दृष्टिकोण का उपयोग करें,मुफ्त सुविधा से होने वाले खर्च के धन को बान्ध व अन्य जीवनोपयोगी कार्य और रचनात्मक कार्य में लगाना चाहिए।

इन प्रलोभनो से हटकर प्रदूषण व प्राकृतिक आपदा,बेमौसम बारिश के कारण कृषक व मजदूर के फसल के रूप में होने वाले आर्थिक नुकसान से बचने व इन प्रकोप से मानवीय स्तर पर निपटने की योजना बने,ज्ञातव्य है कि प्रदूषण व प्राकृतिक कारणों से प्रायः हर वर्ष बेमौसम बारिश होता है जिसका सीधा असर किसानों पर पड़ता है।

एक समग्र आर्थिक विकास के माडल की खोज हो जो जीवन की सार्थकता सिद्ध कर सके,अत एवं आज के परिप्रेक्ष्य में विकास का नूतन रूप अपेक्षित है जिसमेँ व्यक्ति भूख,कुपोषण,गरीबी,बेरोजगारी, असुरक्षा व अमानवीय शोषण से पीड़ित न हो, इसी के आथार से समाज पल्लवित व विकसित हो सकता है व जिससे जनता के समग्र व सार्थक विकास का पथ प्रशस्त होगा।

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