डॉ. बिजेंद सिन्हा जी का संपादकीय लेख “सच्ची सफलता”।
B. R. SAHU CO-EDITOR
Cg24News-R :- वर्तमान समय में भौतिक सुविधाओं धन और पद को ही सफलता का पर्याय माना जाने लगा है। वास्तव में नीतिगत जीवन, आदर्शो व मूल्यों के साथ अपने लक्ष्य तक पहुंचना ही सच्ची सफलता है lअगर हम सार्वजनिक, राजनीतिक सन्दर्भ में देखें तो मूल्यों व आदर्शों के साथ सफलता हासिल करना ही सच्ची राजनीतिक जीत है। निश्चित ही राजनीति जनसेवा का सशक्त माध्यम व विमर्श का विषय है। प्राचीन भारत में राजनैतिक व्यवस्था, सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा हुआ करती थी ।इसलिए प्राचीन समय से ही ऐसे शासन तन्त्र को विकसित करने के प्रयास किए गए जिसमें राजनीतिक व्यवस्था, सत्ता के सिंहासन पर आरूढ़ होने की सीढ़ियां मात्र बनकर नहीं रह जाए। सत्ता मात्र सत्ता सुख अर्थात भोग- विलास की वस्तु बन कर ही न रह जाए । जबकि राजनैतिक व्यवस्था प्रजापालन, अभि वर्धन, उत्साहवर्धन, आनन्द वर्धन व निरन्तर संरक्षण के साथ राष्ट्र के चहुँमुखी विकास का आधार बन सके। शासक को राज्य, समाज एवं जनहित का विशेष रूप से विचार करना होता था। राजनैतिक व्यवस्था के प्रजापालन कर्ता भाव को यहाँ एक व्यापक आधार बनाया गया था। परन्तु वर्तमान समय में राजनीतिक व्यवस्था सत्ता- सुख का माध्यम बनता जा रहा है।राजनैतिक जीत हासिल करने के लिए विभिन्न हथकण्डे अपनाए जाते हैं। पहले राजनीति में शुचिता थी, नैतिकता बाकी था। इसलिए अवांछनीय हथकण्डे नहीं अपनाए जाते थे। धीरे-धीरे राजनीति सत्ता सुख का माध्यम बनती जा रही है ।सत्ता के सामने विचारधारा, आदर्श, मूल्य सब तुच्छ होते गये। सत्ता के लिए विरोधी विचारधारा वाले राजनीतिक दल भी समझौता कर लेते हैं। इससे न सिर्फ जनादेश की अवहेलना होती है बल्कि लोकतंत्र कमजोर होता है।सत्ता सर्वोपरि हो जाता है, देशहित पीछे छुट जाता है। लेकिन क्या वास्तव में अवांछनीय तरीके से अपनायी गयी सफलता सच्ची सफलता है। संसार के मापदंडो में सफलता के गहरे अर्थ हो सकते हैं। सही मायने में सफलता भी किसी असफलता से अधिक असफल होता है। वास्तव मेँ सफलता एवं असफलता के जो आधार हैं वे उच्च आदर्श एवं लक्ष्य में निहित हैं। जिन्होंने अपने आदर्शों एवं नैतिकता के साथ काम किया और आगे बढ़ा और अनगिनत बार असफल हुआ वह भी सफल कहलाएगा लेकिन जिसने आदर्शों व मूल्यों के साथ समझौता करके, आदर्शो व मूल्यों को दरकिनार करते हुए सफलता अर्जित की वह सफल होकर भी असफल कहलाएगा। ऐसी सफलता को कोई सौ बार हासिल कर ले तो भी सच्ची सफलता नहीं कही जा सकती। सफलता की असली पहचान यही है किन मूल्यों से प्राप्त किया गया है। यदि हम किसी भी तरह से जोड़-जुगाड़ से सफल हो गए तो यह सफलता हमें सालती रहेगी, अशान्त करेगी। इसके विपरीत श्रेष्ठ कर्म करने के पश्चात भी यदि हमें वांछित सफलता नहीं मिल पाती है तो भी हमारे अन्दर आत्मसंतोष रहता है। सच्ची सफलता इसी में है कि हम मूल्यों व आदर्शों के साथ पूर्ण मनोयोग से आगे बढ़ें। कई ऐसे महान व्यक्ति हुए हैं जो जीवन में सफल नहीं हो पाए , पर उनके सफल नहीं होने पर ही उनके जीवन का मूल्यांकन नहीं होता। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धा सुभाष चन्द्र बोस, महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आजाद एवं महान स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी व हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक अशफाक उल्ला खां और अन्य व्यक्ति सफल नहीं हो सके। उनके सामने देश आजाद नहीं हो सका। इसी तरह अनेक महापुरुषों योद्धाओं राजनीतिज्ञों के जीवन काल में उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिल सका। परन्तु इस असफलता के बावजूद उनका जीवन उनके उद्देश्य की दृष्टि से सफल कहलाएगा, ये सभी वन्दनीय हैं क्योंकि इन्होंने इतने ऊँचे आदर्शो को अपनाया कि उनके बाद उनको प्रेरणास्रोत बनाकर चलने वालों की, संघर्ष करने वालों की कमी नहीं। इसके विपरीत सफलता प्राप्ति के अनेक ऐसे उदाहरण हैं जहाँ सफलता मिलने पर भी उनको श्रेयस्कर नहीं कहा जा सकता।यदि कोई अनैतिक, अवांछनीय तरीके अपनाकर अनगिनत बार भी सफलता हासिल कर ले तो यह सच्ची सफलता नहीं है। ऐसे तरीके अपनाकर अनगिनत बार भी सफलता हासिल कर ले तो ऐसा कर लेने से उनकी सफलता वंदनीय नहीं हो जाती। जीवन में सच्ची सफलत यानि नीतिगत जीवन, आदर्श निष्ठ जीवन। वास्तव में सफल उसे कहते हैं जो मूल्यों और आदर्शों के साथ अपने लक्ष्य तक पहुंचता है। सफलता केवल भौतिक साधनों सत्ता या उच्च पद प्राप्त करने तक सीमित नहीं है बल्कि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में संतुलन, चरित्र की ईमानदारी ,सामाजिक राजनीतिक, दायित्वों को पूरा करने की है।
राजनीति के सन्दर्भ में शुद्धतम व उच्चतम राजनैतिक मूल्यों को अपनाना व राजनीति में सम्मान, मर्यादा व राष्ट्रीय गौरव को बनाए रखकर राजनैतिक दायित्वों को पूरा करना ही राजनीतिक सफलता है। वास्तव में मूल्यों व आदर्शों के साथ अपने लक्ष्य तक पहुंचता ही सच्ची सफलता है।