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डॉ. बिजेन्द सिन्हा जी का संपादकीय लेख “नफरत को मिटाने से आएगी शान्ति”

रानीतराई :- अशान्त हिंसात्मक भेदभाव आतंक घृणा स्वार्थ व भय ग्रस्त परिवेश मे गांधी जी के सत्य अहिंसा प्रेम शान्ति एकता सद्भाव स्वतन्त्रता समानता भातृत्व सामन्जस्य व सादगी के विचार आज भी प्रासंगिक हैं। गांधी जी सिर्फ देश की स्वतंत्रता ही नहीं बल्कि भारत सहित सम्पूर्ण विश्व मे स्वतन्त्रता समानता भातृत्व सत्य अहिंसा सत्याग्रह एवं मानव मूल्यों पर आधारित एक ऐसे समाज की स्थापना की जिसमें किसी के साथ धर्म ,जाति, नस्ल आदि का भेदभाव न हो। अहिंसा के रूप उन्होंने महान और नैतिक पथ निर्मित किया। वे अहिंसा के आधार से मनुष्य का जीवन, सम्पूर्ण मानव समाज और जगत की व्यवस्था के लक्ष्य की कल्पना की ।गांधी जी अहिंसा वीरता दृढता तथा धैर्य पर आधारित है जो अत्याचार व अनाचार को,जगत की सारी शस्त्र शक्ति और द्वेष तथा दम्भ से युक्त व्यवस्था की सारी दमनात्मक प्रवृति को चुनौती देती है।उनका गहरा दृष्टिकोण था कि पशुता पर देवता की विजय तब होगी जब नैतिक और शुभ अस्त्रों से अनैतिक और दानव भाव की पराजय हो। उनकी अहिंसा नैतिकता पर आधारित है। गांधी जी अहिंसक क्रान्ति, हिंसाहीन संघर्ष,सत्य और अहिंसा का सहारा लेकर दमनकारी अन्ग्रेजी साम्राज्य को चुनौती दिया दूषित विचार सबसे बड़ा हथियार होता है। हथियारों की अपेक्षा नफरत ,भेदभाव और घृणा जैसे विचार ज्यादा खतरनाक होते हैं ।आजादी के इतने वर्ष व शिक्षा का स्तर बढने के बाद भी देश के कुछ हिस्सों में आज भी उन्माद व भेदभाव जनित हिंसा देखने को मिलती है, यह राष्ट्रीय एकता में बाधक है व गाँधी जी के विचारों के विपरीत है। देश में नफरत व घृणा नहीं बल्कि सहानुभूति व सदभावना की अभिवृद्धि होना चाहिए ।वर्तमान समय में जब देश को समावेशी विकास की जरुरत है,समाजिक व आर्थिक लोकतंत्र का लक्ष्य अभी पूर्ण नहीं हुआ है। वर्तमान समय में बंटते समाज,असमानता और मतभेदों के इस दौर में गांधी जी के विचार अनुकरणीय है। विभाजनकारी व कट्टरवादी सोच भारतीय एकता के लिए बाधक है ।अतः गांधी जी के सद्भाव और समन्वयकारी विचार को अपनाने की जरुरत है । वर्तमान में भेदभाव की वजह से कहीं -कहीं जातिगत हिंसा देखने को मिलता है।यह भी गांधी जी के विचारों के विपरीत है। गांधी जी का दर्शन मानव जीवन व संसार के लिए नैतिक भाष्य है। वर्तमान परिवेश में गांधीवाद का प्रदर्शन तो बहुत होता है पर उनके विचारों को हम भुल रहे हैं। गांधी जी की आर्थिक नीति मे किसी को खाने और पहनने के लिए तरसना न पडे,का भाव शामिल था। वे सम्पत्ति के असंतुलित आधार के विरूद्ध थे। गांधी जी की अहिंसा में व्यापकता व समग्रता का बोध समाहित है जिसके कारण विश्व के लिए प्रेरणीय है। इसी कारण संयुक्त राष्ट्र संघ ने अहिंसा दिवस मनाने की शुरुआत की। उन्होंने असत्य पर सत्य की विजय व अहिंसा जैसे नैतिक शक्ति से समाज व देश का प्रकाश पूर्ण नेतृत्व किया। यही वह स्वप्न है जिसे गान्धीजी ने देखा व जिसे साकार करने का दायित्व हम सभी देश वासियों पर है।
वर्तमान परिवेश में राजनीति के चलते सामाजिक व धार्मिक विभाजन बढे हैं। ऐसे परिवेश मे गांधी जी के प्रेम सदभावना एकता व समन्वयकारी आदि विचारों को अपनाने की जरुरत है । गांधी जी सत्य अहिंसा का उपयोग भविष्य में राष्ट्र के पुनर्निर्माण में अपना भावी दृष्टिकोण रखने के लिए करते रहे, उनके विचारों व सपनों का विकसित राष्ट्र बनाने के लिए विकास के नये विजन के साथ विभाजनकारी चुनौतियों से पार पाना होगा व कमियों को दूर करना होगा इसी में हम सबकी भलाई है।
बिजेन्द सिन्हा।

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