डॉ.बिजेंद सिन्हा जी का संपादकीय लेख “बढ़ चलें सार्थक गणतंत्र की ओर”।
B. R. SAHU CO-EDITOR
Cg24News-R :- हमारा देश कई क्षेत्रों में कीर्तिमान स्थापित कर विश्व समुदाय में स्थान बनाया है। परन्तु वर्तमान समय में कई क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है।कुपोषण, बेरोजगारी, बढ़ते रोग,निरन्तर बढ़ते अपराध, आर्थिक असमानता, पर्यावरण प्रदूषण आदि मूल गम्भीर समस्याएं हैं। कुपोषण व पर्यावरण आदि समस्याओं पर वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित प्रयासों की आवश्यकता है।सामाजिक अन्याय, भेदभाव, असमानता, अपराध आदि कारक सच्चे गणतंत्र की स्थापना के लिए बाधक है। संसदीय गणतंत्र व्यवस्था में हर आदमी को अपनी स्वतंत्र सोच विकसित करने का मौका मिले। सच्चे गणतंत्र की स्थापना के लिए सामाजिक न्याय, मजबूत लोकतंत्र, परिष्कृत शासन तन्त्र की जरूरत है। मौजूदा परिवेश में सामाजिक समरसता, सामाजिक सद्भाव में आई कमी आदि चुनौतियां हमारी प्रगति की राह में बाधक हैं। भौतिक विकास के उपभोग के लिए शांति पूर्ण माहौल भी होना चाहिए। वर्ग, जाति,धर्म, सम्प्रदाय के आधार पर बंटता जा रहा समाज वर्तमान समय की मुख्य समस्याएं हैं।
सामाजिक व्यवस्था के दो महत्वपूर्ण अंग हैं। धर्म तंत्र और राज तंत्र या शासन व्यवस्था। व्यक्ति सही दिशा में चले ,उसका जीवन न्याय नीति सदाचार से चले। उसके व्यक्तित्व में सद्भावनाओं सद्गुणों एवं सत्कर्मों का वास हो, ये जिम्मेदारी धर्म तंत्र की मानी जा सकती है। या व्यक्ति के व्यक्तित्व को निखारने की को निखारने की जिम्मेदारी धर्म की आध्यात्म की है। जबकि सामाजिक विकास की जिम्मेदारी सरकार की, प्रशासन की,राजनीतिक नेतृत्व की है। वर्तमान में इस समीकरण को और मजबूत होने की जरूरत है। वस्तुतः इन दोनों का उद्देश्य वैयक्तिक विकास से लेकर सामुदायिक विकास को सुनिश्चित करना है। पहले उनकी जिम्मेदारी स्पष्ट थी और एक- दूसरे के कार्य में उनका कोई हस्तक्षेप न था। यह स्पष्ट अवधारणा ही भारत के सर्वांगीण विकास का आधार बन सकी थी। देश का इतिहास उठाकर देखें तो हम पाएंगे यहाँ सामाजिक विकास और वैयक्तिक उन्नति, श्रेष्ठता एवं समाज की उन्नति, प्रगति और व्यक्ति का उत्थान व विकास साथ-साथ होते रहे। क्योंकि धर्म तंत्र व राजतंत्र एक-दूसरे के प्रदत्त भूमिका का निर्वहन किया। धर्म तंत्र यदि जाग जाए तो देश,राष्ट्र, समाज, मानवता सभी की दिशा नियन्त्रित एवं निर्धारित हो जाएगी।
व्यक्ति सभ्य नागरिक का परिचय देते हुए सबके संयुक्त हित पर आस्था रखे। व्यक्तिगत स्वार्थ को सामूहिक स्वार्थ के लिए समर्पण कर देना ही परमार्थ है।देशभक्ति त्याग बलिदान यही है। गौरतलब है कि वर्तमान समय में आदर्श और मूल्य घटते जा रहे हैं। अनाचार,भ्रष्टाचार बढ़े हैं। प्रायः हर स्तर पर नैतिक गिरावट आई है ।इन समस्याओं से पार पाने की जरुरत है। देशभक्ति राष्ट्रीय एकता सामाजिक सद्भाव त्याग जैसे राष्ट्रीय मूल्यों का सम्मान करना समय की मांग है। एकता के आदर्शों से जुड़े हुए उस आदर्श के लिए सब कुछ निछावर कर देने की भावना रखने वाले व्यक्तियों का समूह ही राष्ट्र है। व्यक्ति सबके हित पर आस्था रखे यह आवश्यक है। गणतंत्र दिवस यह संकल्प लेने का अवसर है कि हम अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों का का गम्भीरता से पालन करें। देश की सुरक्षा समृद्धि और आपसी सद्भाव से ही हमारा भविष्य आधारित है। हमारी सर्वांगीण प्रगति का आधार यही भावना बन सकती है। मौजूदा परिवेश में जितनी भी भ्रान्तियाँ व समस्याएं दिखती हैं उसके पीछे सिर्फ कट्टरता ही है। आजादी की लड़ाई में सभी जाति धर्म के लोगों का योगदान रहा है। विश्व में हमारे देश की पहचान धर्मनिरपेक्ष देश के रूप में रहा है जिसको बनाए रखने की जरूरत है। धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत संविधान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हम विचारों ,जाति ,पंथ आदि को खुद के टुकड़े करने के लिए इस्तेमाल न करें। संविधान की सुचारू व्यवस्था के लिए अनिवार्य ऐसी व्यवस्था हो जिसमें सब सहज और सुरक्षित महसूस करें। ऐसे शासनतन्त्र विकसित हो जिसमें जिसमें विशेष जाति, धर्म, वर्ग,मत, पंथ ,सम्प्रदाय का प्रभाव न हो। इनके प्रभाव से मुक्त हो। सद्भाव हमारी संस्कृति का मूल है। लोकतंत्र व आजादी की रक्षा करना हम सबका महत्वपूर्ण दायित्व है। सर्व धर्म समभाव की गौरवशाली परंपरा को बनाए रखना चाहिए जिससे हमारा सामाजिक व राष्ट्रीय अस्तित्व की गरिमा कायम रहे रहे। सामाजिक शान्ति लाने के लिए साम्प्रदायिक सद्भाव की रक्षा करना हमारा महत्वपूर्ण दायित्व है। मौजूदा परिवेश में समग्र विकास के लिए
उच्चतम, शुद्धतम मूल्यों आधारित राजनीति होना चाहिए। धर्म तंत्र यदि जाग जाए तो देश, राष्ट्र, समाज, मानवता सभी की दिशा नियन्त्रित एवं निर्धारित हो जाएगी। धर्म तंत्र का कार्य आध्यात्म के संदेश को जन-जन तक पहुंचाना है, उनमें मानवता के मूल्यों का, सद्गुणों का विकास करना है ।धर्म तंत्र का ऐसा जागरण ही
राजतंत्र यानि शासन व्यवस्था की दिशा निर्धारित कर सकता है। वर्तमान समय में उसी जागरण की आवश्यकता है जिससे हमारा देश शांतिपूर्ण उज्जवल भविष्य की ओर अग्रसर हो सके।