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बच्चे गोबर बिनते रहे पस्त, जिम्मेदार अधिकारी मस्त—गोबर उठवाने का BEO हिमांशु मिश्रा जंबूरी आयोजनों से कमा रहा है पैसा

शशिकांत सनसनी छत्तीसगढ़

बालोद _छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के डौंडीलोहारा विकासखंड अंतर्गत प्राथमिक विद्यालय संबलपुर में स्कूली बच्चों से गोबर उठवाने का मामला प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर करारा तमाचा है। यह कृत्य न सिर्फ अमानवीय है, बल्कि बाल अधिकारों, मानवीय गरिमा और कानून—तीनों का खुला उल्लंघन है।
स्कूल की तथाकथित साफ-सफाई के नाम पर मासूम बच्चों को सड़क पार कर मैदानों से गोबर बीनने भेजा गया। बच्चे बाल्टियों में गोबर भरकर स्कूल लाते रहे और शिक्षक तमाशबीन बने रहे। यह दृश्य किसी आधुनिक राज्य का नहीं, बल्कि मध्यकालीन सोच और व्यवस्था का प्रतीक प्रतीत होता है। यहां शिक्षा का अर्थ ज्ञान नहीं, बल्कि श्रम शोषण बनकर रह गया है।
सामने आई यह घटना केवल एक स्कूल की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के नैतिक पतन का आईना है।


इस पूरे प्रकरण में विकासखंड शिक्षा अधिकारी (BEO) हिमांशु मिश्रा की भूमिका सबसे अधिक संदेह के घेरे में है। मीडिया द्वारा सवाल किए जाने पर उनका “ऑन कैमरा कुछ नहीं कह पाऊंगा” कहना प्रशासनिक संवेदनहीनता को उजागर करता है। जब बच्चों के सम्मान, सुरक्षा और अधिकारों का सवाल हो, तब रिपोर्ट मंगाने की औपचारिकता नहीं, बल्कि त्वरित और कठोर कार्रवाई अपेक्षित होती है।
और भी शर्मनाक पहलू यह है कि इस गंभीर मामले में स्कूल प्रशासन से लेकर शिक्षा विभाग तक जिम्मेदारी से बचता नजर आया। शिक्षकों से सवाल किए गए तो किसी ने जवाब देना जरूरी नहीं समझा। प्रधान पाठक ने अवकाश का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लिया, वहीं उपस्थित शिक्षक एक-दूसरे पर दोष मढ़ते रहे।
बच्चों के बयान साफ करते हैं कि यह काम हर सप्ताह कराया जाता था। यानी यह कोई एक दिन की भूल नहीं, बल्कि लंबे समय से चला आ रहा सुनियोजित अत्याचार है। सवाल यह है कि शिक्षा अधिकारी अब तक क्या देख रहे थे? निरीक्षण, निगरानी और जवाबदेही सिर्फ कागजों तक ही क्यों सीमित रह गई?
यह सामूहिक चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि गलती आकस्मिक नहीं, बल्कि नियमित और संरक्षित थी। जिम्मेदारी से बचने की यह प्रवृत्ति सीधे-सीधे कर्तव्यहीनता और प्रशासनिक अपराध की श्रेणी में आती है।
कानून पूरी तरह स्पष्ट है।
बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम 2005, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 और छत्तीसगढ़ शिक्षक आचरण संहिता के तहत बच्चों से शारीरिक श्रम करवाना दंडनीय अपराध है। यह कृत्य कर्तव्य के दुरुपयोग, बाल गरिमा के उल्लंघन और अनुशासनहीन आचरण की श्रेणी में आता है, जिसके लिए निलंबन, विभागीय जांच और सेवा से बर्खास्तगी तक का प्रावधान है।
साथ ही, BEO स्तर पर निगरानी में चूक को गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना जाता है, जिस पर भी सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई अनिवार्य है।
यह मामला केवल संबलपुर स्कूल तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह पूरे शिक्षा विभाग के लिए चेतावनी है। यदि दोषियों पर उदाहरणात्मक कार्रवाई नहीं हुई, तो कटघरे में सिर्फ शिक्षक नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था खड़ी होगी।
बच्चों से गोबर उठवाने वालों पर और उन्हें संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर कड़ी धाराओं में कार्रवाई जरूरी है।
वरना स्कूल शिक्षा के मंदिर नहीं, बल्कि शोषण के केंद्र बनकर रह जाएंगे।

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