Sunday Editorial । kirit Thakkar
गरियाबंद में हाल के दिनों में मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी द्वारा जिले में संचालित दो निजी अस्पतालों के लाइसेंस निलंबन की कार्रवाई की गई है। इनमें एक जिला मुख्यालय तथा दूसरा छुरा क्षेत्र में संचालित अस्पताल है। यह कार्रवाई मीडिया में प्रकाशित खबरों, जांच दल के प्रतिवेदन एवं अभिमत के आधार पर की गई है।
प्रथम दृष्टया यदि कहीं अनियमितता पाई जाती है, तो कार्रवाई होना स्वाभाविक और आवश्यक भी है। किंतु इस संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठते हैं। क्या जिले में संचालित सभी निजी अस्पताल, प्राइवेट क्लिनिक, पैथोलॉजी लैब एवं डायग्नोस्टिक सेंटर छत्तीसगढ़ राज्य उपचर्या गृह एवं रोगोपचार संबंधी स्थापना अनुज्ञापन अधिनियम 2010 एवं 2013 के प्रावधानों के अनुरूप संचालित हो रहे हैं?
क्या कभी व्यापक स्तर पर यह जांच की गई कि जिले में पंजीकृत आयुर्वेद अथवा होम्योपैथी क्लिनिकों में एलोपैथिक उपचार तो नहीं किया जा रहा ? जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में मेडिकल स्टोर की आड़ में चिकित्सा कार्य करने वाले कितने लोग सक्रिय हैं ?
जिले में व्यापक, वास्तविक तथा गंभीर जांच करने पर यह तथ्य भी सामने आ सकता है, कि कई पैथोलॉजी लैब बाहरी जिलों या दूर-दराज के शहरों में निवासरत डॉक्टरों के नाम पर संचालित हो रहे हैं। ऐसे में यह भी जांच का विषय है कि संबंधित डॉक्टर अपनी पंजीकृत संस्थाओं में कितनी नियमित उपस्थिति देते हैं।
नगर में जिला अस्पताल के समीप संचालित डायग्नोस्टिक सेंटर के संबंध में भी शिकायतें सामने आई हैं, जहां विभिन्न जांचों के बाद मरीजों को केवल रिपोर्ट दी जाती है, परंतु विधिवत बिल नहीं दिया जाता। यदि बिल दिया भी जाता है, तो उसमें डायग्नोस्टिक सेंटर की पंजीयन संख्या, संबंधित डॉक्टर का एमसीआर नंबर तथा अधिकृत मुहर का अभाव पाया जाता है। क्या इस दिशा में संबंधित अधिकारियों का ध्यान गया है ?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, छुरा स्थित श्री संकल्प छत्तीसगढ़ मिशन अस्पताल में उपचार के दौरान हाल के दिनों में 5-6 मरीजों की मृत्यु के मामले सामने आये हैं, जो मीडिया में भी प्रमुखता से प्रकाशित / प्रसारित हुये है। इनमें टेंगनाबासा निवासी हेमंत सिन्हा, दुल्ला के तुलेश्वर पटेल, लोहझर की एक महिला एवं खुसुरुपाली निवासी गोकुल ठाकुर के नाम बताये जाते हैं।
ग्राम टेंगनाबासा के हेमंत सिन्हा सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हुये थे। उनके पिता दिलीप सिन्हा के अनुसार, सिर में गंभीर चोट, नाक-कान से रक्तस्राव एवं कंधे की हड्डी टूटने जैसी स्थिति के बावजूद, उन्हें उक्त अस्पताल में 9 दिनों तक भर्ती रखा गया। जानकारों का कहना है कि इस अस्पताल में न्यूरोलॉजिस्ट उपलब्ध नहीं है । ऐसे में प्रश्न उठता है कि गंभीर हेड इंजरी का उपचार किस विशेषज्ञ द्वारा किया जा रहा था ? साथ ही, सड़क दुर्घटना की सूचना पुलिस को मृत्यु के पश्चात दिये जाने का मामला भी गंभीर चिंतन का विषय है।
इन घटनाओं के व्यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद यदि कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो यह प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जिन दो अस्पतालों पर कार्रवाई की गई, वह उचित हो सकती है। किंतु लोकतंत्र में “समान न्याय” का सिद्धांत यह अपेक्षा करता है कि कानून का पालन सभी पर समान रूप से हो—न कि कुछ को दंडित कर अन्य को अनदेखा किया जाये।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी नागरिक, चाहे उनकी सामाजिक,आर्थिक या अन्य कोई भी स्थिति हो, कानून के समक्ष समान होते हैं। किन्तु यदि कार्रवाई चयनात्मक प्रतीत होती है, तो इससे प्रशासन की निष्पक्षता पर संदेह उत्पन्न होता है।
कलयुग में डॉक्टर को ‘भगवान’ का दर्जा दिया जाता है, “जब कोई व्यक्ति पीड़ा में होता है, तब डॉक्टर उसकी आशा की अंतिम किरण होता है।” `एक डॉक्टर का दायित्व केवल उपचार तक सीमित नहीं, बल्कि नैतिक व सामाजिक उत्तरदायित्वों के निर्वहन से भी जुड़ा होता है।
इसके विपरीत, यदि प्रशासनिक कार्रवाई एकतरफा या चयनात्मक प्रतीत होती है, तो इससे समाज में भय एवं अविश्वास का वातावरण बन सकता है, जो लोकतंत्र की भावना के अनुकूल नहीं है।
