Cg24News-R :- सदियों से सामाजिक परम्पराओं, दकियानुसी रिति- रिवाजों और रूढ़ीवादी नियमों से बन्धे भारतीय समाज में प्रेम संबंध के चलते लाखों जिन्दगीयां तबाह हो जाती हैं। निश्चित ही इन मामलों में अपहरण,बलात्कार, छेड़छाड़ जोर जबरदस्ती , अपराध है परन्तु प्रेम -संबध के कारण आए दिन होने वाले जघन्य हत्याएँ, आत्महत्याएं, युगलों द्वारा एक साथ आत्महत्याएं ,परिवार के सम्मान के नाम पर हत्याएँ आदि मानवता को शर्मसार करने वाली अप्रिय घटनाएं वर्तमान वैज्ञानिक युग, 21 वीं सदी के आधुनिक व शिक्षित समाज को सोचने पर मजबूर करती हैं।एक तरफ आधुनिकता और विकास के नए कीर्तिमान कायम किए जा रहे हैं वहीं दकियानुसी विचारों के कारण कई जिन्दगियां बर्बाद हो जाती हैं। कुछ समुदायों में इतनी कट्टरता है कि ‘ अपनी पसंद ‘ से शादी कर लेने से अपनी ही संतानों की निर्मम हत्या कर दी जाती है। अधिकतर हिंसात्मक घटनाएं अपनी पसंद से शादी या जबरन शादी करने से होता है। आज के शिक्षित व आधुनिक समाज में भी जातिगत भेदभाव के चलते आनर किलिंग यानि कथित सम्मान के लिए अमानवीयता की सारी हदों को पार करते हुए परिजनों द्वारा अपनी ही युवा सन्तानों की निर्मम हत्या कर दी जाती है जिसे कथित सम्मान के लिए हत्या कहा जाता है।
भारत का संविधान हमें
साफ-साफ बताता है कि हम एक सम्प्रभु , धर्मनिरपेक्ष देश में रहते हैं। भारतीय संविधान में तो किसी भी बालिग को यह अधिकार है कि वे अपनी पसंद से शादी कर सकते हैं। इसके बावजूद हम देखते हैं कि आए दिन युवा युवतियों की हत्या, आत्महत्या के मामले लगातार आते रहते हैं । इनमें कई हत्याएं ऐसी हैं जो उनके अपने परिवार द्वारा की जाती है।ये हत्याएँ वयस्क लोगों की निजता, आजादी और परस्पर सहमति के खिलाफ़ है। साथ ही विडम्बना यह है कि इन हत्याओं को ‘ आनर किलिंग यानि कथित सम्मान के नाम पर हत्या कहा जाता है। प्रेम प्रसंग में अपराध व हिंसा के मूल कारणों में धोखा, आनर किलिंग ,अत्यधिक मानसिक असन्तुलन, जुनून ,हिंसा, खुला संवाद व पारिवारिकि सहमति का न होना, पारिवारिक दबाव, कानूनी जागरूकता का अभाव अहंकार आदि कारण हैं।
प्रेम एक दिव्य भाव है लेकिन जब इसमें जुनून , अहंकार आदि दुर्भाव जुड़ जाते हैं तो प्रेम की आड़ में अपराध होने लगता है। जाति, धर्म या कथित सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर प्रताड़ना हत्या या अपने ही परिवारजनों द्वारा हत्या मानवता के खिलाफ है। पशु- पक्षियों व मनुष्य में भले ही चेतना शक्ति का ही अन्तर है।परन्तु पशु -पक्षियों का जीवन भी प्रेम और संवेदना से परिपूर्ण होता है। पशु -पक्षी भी अपनी सन्तान की सुरक्षा के हर उपाय करती हैं। आज लोग आधुनिक व वैज्ञानिक युग में चल रहे हैं।लेकिन दकियानुसी विचार आज भी कायम है। जिन जड़ताओं और दकियानुसी विचार धारा के कारण सामाजिक विकास बाधित माने जा रहे हैं उसे और मजबूत करने के लिए संवैधानिक अधिकार तक का ख्याल नहीं रखा जा रहा है। जब तक समाज में दकियानुसी विचार कायम रहेंगे तब तक सामाजिक विकास की कल्पना नहीं की जा सकती। इस सदी में देश के युवा लगातार नई उंचाइयां छूकर धरती ,आसमान नाप लिया हो । पुरानी रूढ़ियों को तोड़ कर हर क्षेत्र में अपनी क्षमता साबित कर रहे हों, तब इस तरह की घटना बेहद अफसोस जनक है। समाज में वर्तमान दौर में कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं जिन्हें सामाजिक विकास की कसौटी पर जड़ता के उदाहरण के तौर पर ही देखा जा सकता है।यह कैसी हमारी आधुनिकता है और कैसा हमारा विकास है कि कई जानें पुरानी मान्यताओं के कारण चली जाती हैं। इस तरह अगर जानें जा रही हैं तो यह सोचने का विषय है यह है कि सामाजिक विकास के इतने लम्बे सफर में हमारी सफलता इतने दुखद क्यों है। यह कैसे समाज की रचना हो रही है जहाँ भौतिक विकास तो बहुत हो रहा है लेकिन मानवीय संवेदना क्षीण होती जा रही है। हिंसा व अपराध से किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। लोगों में कानून के भय का समाप्त होते जाना भी चिन्तन का विषय है। इस तरह हजारों लोगों को जान गंवानी पड़ रही है तो हमारी सारी मानवीय प्रगति बेमानी साबित होती है।ऐसी निर्मम व जघन्य घटनाएं न सिर्फ समाज को विचलित करती हैं बल्कि समाज में वैचारिक बदलाव व नये दृष्टिकोण के लिए प्रेरित करती ।निश्चित ही स्वतंत्रता या व्यक्तिगत स्वतंत्रता की आड़ में नैतिकता की अवहेलना या फिर मानवीय गरिमा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए परन्तु दकियानुसी रीति- रिवाजों के नाम पर प्रति वर्ष कई युवक-युवतियों की हत्याएं ,आत्महत्याएं व कानून का परवाह न करना अत्यंत चिन्ताजनक है। ऐसी घटनाओं को सामाजिक समस्याओं के रूप में देखा जा सकता है जो सामाजिक विकास की दिशा में चुनौती है। सम्भवतः देश में आतंकवाद या अन्य कारणों से जितनी जानें नहीं जातीं उतनी प्रेम -प्रसंग के कारण जाती हैं। इसे कानून ,प्रशासन के साथ-साथ सामाजिक समस्याओं के रूप में भी देखा जाना चाहिए। वर्तमान समय भी समाज में यह अवधारणा बेहद पुख्ता है कि जो युवक- युवतियां जातिगत मान्यताओं को तोड़ने की कोशिश करे तो उनका प्रताड़ित होना जायज है। ऐसे समाज का निर्माण हो जिसमें सभी व्यक्ति घर, परिवार व समाज में स्वयं को सुरक्षित महसूस करें। छुआ-छूत, जातिगत भेदभाव, उंच-नीच आदि से संबंधित कोई विशेष विचारधारा अगर संविधान से टकराता है तो संविधान की बात ही मानी जानी चाहिए। समाज का कोई भी नियम संविधान से उपर नहीं हो सकता। ऐसी समस्याओं के समाधान के लिए वैचारिक क्रांति लानी होगी। आधुनिकता सिर्फ रहन- सहन ,भाषा वेश- भूषा व जीवनशैली में ही नहीं जीवनशैली में ही नहीं बल्कि आधुनिकता विचारों में भी होना चाहिए।वैज्ञानिक दृष्टिकोण व तर्कपूर्ण जीवनशैल होना चाहिए। कानूनी जागरूकता ,संयम ,खुला संवाद, पारिवारिक बातचीत, मानसिक सन्तुलन के लिए प्रयास करने होंगे। स्वास्थ्य समस्या,तनाव प्रबंधन, भावनात्मक समस्याओं के समाधान के लिए स्वास्थ्य विशेषज्ञों से जानकारी लेना चाहिए। आधुनिक व विकसित मानसिकता वाले युग में भी हो रही इस तरह की घटनाओं पर गम्भीर चिन्तन की जरूरत है।ऐसे में जरूरत इस बात की भी है कि बच्चों के पालन- पोषण और उनके सामाजिक प्रशिक्षण की बुनियाद को इतना मजबूत बनाया जाए कि वे विकास की तमाम सम्भावाओं और रास्तों को अपने और समूचे मानव समाज के हित में इस्तेमाल करना सीखें। सद्भावना व मानवीय संवेदना को विकसित करने होंगे, तब लोग अपने जाति, वंश ,क्षेत्र के कारण नहीं बल्कि अपने गुण, कर्म व स्वभाव के आधार पर अपनी पहचान प्रदर्शित करेंगे ऐसे समाज की स्थापना के प्रयास हों कि लोगों को उन्हें मानव और मानवीय गुणों को समृद्ध करने में गर्व की अनुभूति हों। परम्पराएं मानव विवेक के अनुसार परिमार्जित ,परिष्कृत व परिवर्तित हों। समाज में संवेदना के सूत्र सुदृढ़ करने होंगे जिससे हिंसा न हों और मानव में यह पशुता- पाशविकता कहीं भी नजर न आए। आधुनिक व विकसि मानसिकता वाले युग में भी हो रही इस तरह की घटनाओं पर चिंतन की जरूरत है। हमेशा ही युवाओं से परिवार ,समाज व देश भविष्य की आशा रखता है। अतः युवा वर्ग मानवीय जीवन की गरिमा को समझते हुए व उद्देश्यपरक जीवन जीते हुए हुए परिवार, समाज व राष्ट्र निर्माण का हिस्सा बने। विचारवान प्रबुद्ध वर्ग द्वारा इन सामाजिक बुराइयों को दूर करने व सामाजिक शान्ति लाने के लिए संविधान, समानता और इंसानियत के मार्ग पर चलने की जरूरत है।
उम्मीद की जाती है कि कोई भी सभ्य समाज पुरानी मान्यताओं को तोड़ कर एक मानवीय मूल्यों वाले समाज की जड़ों को मजबूत करने में अपनी भूमिका निभाएगा।
डॉ. बिजेन्द सिन्हा जी का संपादकीय लेख “इश्क ले रहा है युवाओं की जान”।
